अगर मोह से मन सदा मोड़ दे भजन
अगर मोह से मन सदा मोड़ दे भजन
अगर मोह से मन सदा मोड़ दे,
बुरे कर्म अपने अगर छोड़ दे ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे,
मगर ईश का ध्यान करना पड़ेगा,
सखे! सुन मेरे...।
द्रौपदी को दु:शासन बेपरदा करे,
पुकारे जभी, लाज उसकी हरे ।
कोई ऐसा ग़म ना प्रभु ना हरे,
अजामिल प्रभु नाम से ही तरे ।
गज मोक्ष देखो प्रभु ने किया,
प्रह्लाद का दुःख सदा हर लिया ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे...।
कर याद प्रभु की कृपावृष्टि का,
हो जा प्रभु की दया दृष्टि का ।
प्रभु है रचयिता पूरी सृष्टि का,
बना ले तू अपना उसे दृष्टि का ।
अगर भाव से उसको कोई भजे,
गया जो शरण में प्रभु ना तजे ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे...।
चलो राह सत की, असत से डरो,
मन की न मानो, न मन की सुनो ।
अगर प्रभु को पाना तुम्हें है सुनो,
प्रभु नाम को प्यारे जल्दी चुनो ।
तुम भी चुनो कांत प्रभु नाम को,
समय न गंवाओ, तजो काम को ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे...।
बुरे कर्म अपने अगर छोड़ दे ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे,
मगर ईश का ध्यान करना पड़ेगा,
सखे! सुन मेरे...।
द्रौपदी को दु:शासन बेपरदा करे,
पुकारे जभी, लाज उसकी हरे ।
कोई ऐसा ग़म ना प्रभु ना हरे,
अजामिल प्रभु नाम से ही तरे ।
गज मोक्ष देखो प्रभु ने किया,
प्रह्लाद का दुःख सदा हर लिया ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे...।
कर याद प्रभु की कृपावृष्टि का,
हो जा प्रभु की दया दृष्टि का ।
प्रभु है रचयिता पूरी सृष्टि का,
बना ले तू अपना उसे दृष्टि का ।
अगर भाव से उसको कोई भजे,
गया जो शरण में प्रभु ना तजे ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे...।
चलो राह सत की, असत से डरो,
मन की न मानो, न मन की सुनो ।
अगर प्रभु को पाना तुम्हें है सुनो,
प्रभु नाम को प्यारे जल्दी चुनो ।
तुम भी चुनो कांत प्रभु नाम को,
समय न गंवाओ, तजो काम को ।
तब ईश विपदा हरेगा तेरे...।
उपदेशात्मक भजन | अगर मोह से मन सदा मोड़ दे |भजन रचना : #shrikantdasjimaharaj स्वर :कुसुम दीक्षित जी
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प्रभु की भक्ति ही वह मार्ग है, जो जीवन की हर विपदा को हर लेता है। मन को मोह और बुरे कर्मों से मुक्त कर, सच्चे भाव से प्रभु का ध्यान करने से उनकी कृपा बरसती है। जैसे द्रौपदी की पुकार पर प्रभु ने लाज रखी, अजामिल को नाम से तारा, गज और प्रहलाद को मुक्ति दी, वैसे ही उनकी करुणा हर संकट में सहारा बनती है। यह सृष्टि का रचयिता केवल सच्चे मन की पुकार सुनता है, और जो उनकी शरण लेता है, उसे कभी नहीं ठुकराता। सत की राह चुनकर, मन की माया को छोड़कर, प्रभु के नाम को हृदय में बसाना ही सच्चा सुख है। यह भक्ति का रस है, जो समय न गँवाने की सीख देता है और प्रभु के प्रेम में डूबकर जीवन को कृतार्थ करता है।
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Author - Saroj Jangir
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