चलो री सखी देख आये प्यारे रघुरैया भजन

चलो री सखी देख आये प्यारे रघुरैया भजन


चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया,
प्यारे रघुरैया,
हाँ बाजत बधइयां,
चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया।

घर घर बंदनवार पताका,
वरणी न जाए निकैया,
पुर नर-नारी मगन होए गावत,
बाजत आनंद बजैया,
चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया।

राम लखन और भरत शत्रुघ्न,
सुंदर चारों भैया,
कौशल्या कैकयी सुमित्रा,
पुनि पुनि लेत बलइयां,
चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया।

सुर नर मुनि जय जयकार करत हैं,
बरसत सुमन निकैया,
श्री दशरथ जु के आँगन में,
नाचे मस्त कवैया,
चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया।

अति पुनीत मधुमास लगन ग्रह,
वार योग समदैया,
मध्य दिवस में प्रकट हुए हैं,
सभी के सुख दैयाँ,
चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया।

सुन दशरथ नृप खोल खजाने,
मंगल द्रव्य भरैया,
लाल न्योछावर वसन लुटावै,
भूषण वसन जड़ैया,
चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया।

चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया,
प्यारे रघुरैया,
हाँ बाजत बधइयां,
चलो री सखी देख आएं,
प्यारे रघुरैया।



चलो री सखि देख आवें प्यारे रघुरैया (राम भजन) - Maithili Thakur

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चलो री सखि देख आवें प्यारे रघुरैया (राम भजन) - Maithili Thakur 
Chalo ri sakhi dekh aave pyare Raghuraiya - Maithili Thakur
 
अयोध्या में प्रभु राम के जन्म का मंगलमय दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठता है, जहाँ पूरी नगरी हर्ष, उल्लास और बधाइयों से गूंज रही है। घर‑घर बंदनवार, पताकाएँ, दीपों की पंक्तियाँ, नाचते‑गाते नर‑नारी, फूलों की वर्षा और वाद्ययंत्रों की धुन से ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग स्वयं पृथ्वी पर उतर आया हो। राजमहल के आँगन में कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा बार‑बार बलैयाँ लेती हैं, चारों भाइयों के मनोहर स्वरूप को निहारा नहीं जाता और सखियाँ एक‑दूसरे को पुकारकर कहती हैं कि चलो, रघुरैया के दर्शन कर आएँ। मधुमास, शुभ लग्न और मध्यान्ह के पावन समय में प्रकट हुए इस बालक के कारण दशरथ आनंद से सराबोर होकर खजाने खोल देते हैं, वस्त्र, आभूषण और द्रव्य लुटाते हैं, ताकि उनके सुख में पूरी अयोध्या सम्मिलित हो सके।

श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं, समूचे जगत के पालनहार और धर्म की धुरी हैं, जिनका प्राकट्य स्वयं देवताओं, ऋषियों और साधकों के लिए उत्सव का कारण बनता है। रघुकुल के इस रत्न के साथ लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे सुमधुर भाई, तथा कौशल्या, कैकयी, सुमित्रा जैसी माता तुल्य रानियाँ मिलकर एक आदर्श, मर्यादित और प्रेमपूर्ण परिवार की झांकी प्रस्तुत करते हैं। देवता फूल बरसाकर, मुनि जयघोष करके और साधु–संत नृत्य करके यह स्वीकार करते हैं कि धर्म, करुणा और न्याय का युग आरंभ हो रहा है। साधक के लिए यह स्मरण है कि राम जन्म केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि अपने हृदय में भी मर्यादा, सेवा, विनय और भक्ति के रूप में ‘रघुरैया’ को जन्म देने का आमंत्रण है, ताकि उसका जीवन भी अयोध्या की तरह मंगलमय और प्रकाशमय बन सके। 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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