ना मैं चुनरी रंगी है ना मैं चोला रंगया
ना मैं चुनरी रंगी है ना मैं चोला रंगया
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया,
ओ रंगण वाले ने, रंगीला मेरा मन रंगया...
ना मैं ढीया-मंगिया, ना मैं पुत्र मंगया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
ना मैं हीरा मंगया, ना मैं मोती मंगया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
ना मैं महल मंगया, ना मैं मोरिया मंगिया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
ना मैं अन मंगया, ना मैं धन मंगया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
ओ रंगण वाले ने, रंगीला मेरा मन रंगया...
ना मैं ढीया-मंगिया, ना मैं पुत्र मंगया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
ना मैं हीरा मंगया, ना मैं मोती मंगया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
ना मैं महल मंगया, ना मैं मोरिया मंगिया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
ना मैं अन मंगया, ना मैं धन मंगया,
श्याम, रख चरणा दे कोल, मैं तां ऐहों मंगया,
ना मैं चुनरी रंगी है, ना मैं चोला रंगया...
न मैं चुनरी रंगी है न मैं चोला रंगता ओ रंगण बाले ने रंगीला मेरा मन रंगया #भोले
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इस भजन में भक्त का भाव अत्यंत सरल, गहरा और निष्काम है। वह कहता है—ना मैंने अपनी चुनरी रंगी है, ना चोला सजाया है; असल में, जिसने मुझे रंग दिया है, वह रंगरेज प्रभु ही हैं, जिन्होंने मेरे मन को अपने रंग में रंग दिया है। यह रंग बाहरी नहीं, बल्कि अंतरात्मा का रंग है—प्रेम, समर्पण और भक्ति का।
भक्त कहता है कि उसने जीवन में कभी भी सांसारिक वस्तुएँ—जैसे बेटा-बेटी, धन-दौलत, महल, गहने, या सुख-सुविधाएँ—नहीं मांगीं। उसकी एकमात्र प्रार्थना यही रही कि प्रभु उसे अपने चरणों के पास रख लें, उसे अपनी शरण में स्वीकार कर लें। यही उसकी सबसे बड़ी चाहत है।
भजन का सार यही है कि सच्चे भक्त को संसार की कोई वस्तु नहीं चाहिए—ना रिश्ते, ना धन, ना ऐश्वर्य। उसकी एकमात्र अभिलाषा प्रभु के चरणों की शरण है, और यही सच्चा रंग है, जो मन को तृप्त और जीवन को सफल बना देता है। यह भाव कबीर, मीरा और संत परंपरा की उस भक्ति को दर्शाता है, जिसमें बाहरी आडंबर नहीं, केवल अंतरात्मा का समर्पण और प्रभु के प्रति निष्काम प्रेम ही सर्वोपरि है।
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Author - Saroj Jangir
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