आयो रे आयो पर्युषण आयो जन जन के भाग्य संवारने

आयो रे आयो पर्युषण आयो जन जन के भाग्य संवारने


आयो रे आयो पर्युषण आयो,
जन-जन के भाग्य संवारने,
प्रभु की पूजा गुरु की भक्ति,
जिनवाणी मन में उतारने।

क्रोध को त्याग क्षमा को धारो,
मार्दव से मन के मान को मारो,
आर्जव भावों में लाए सरलता,
सत्य मिटाए मन की चपलता,
शौच कहा गुरुवर ने देखो,
अंतर की शुचिता निखारने,
प्रभु की पूजा गुरु की भक्ति,
जिनवाणी मन में उतारने।

मानव जीवन विफल बिन संयम,
तप से कुंदन बनेंगे तन-मन,
त्याग घटाए लोभ आशक्ति,
अकिंचन्य से जागे विरक्ति,
उत्तम ब्रह्मचर्य अपनाओ,
अपनी ही आत्मा निहारने,
प्रभु की पूजा गुरु की भक्ति,
जिनवाणी मन में उतारने।

आयो रे आयो पर्युषण आयो,
जन-जन के भाग्य संवारने,
प्रभु की पूजा गुरु की भक्ति,
जिनवाणी मन में उतारने।



Paryushan Ayo Re | Paryushan Parv Jain Bhajan | पर्युषण आयो रे | दसलक्षण पर्व जैन भजन | #paryushan

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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