विश्वविजय सरस्वती कवच अर्थ महत्त्व

विश्वविजय सरस्वती कवच जानिये अर्थ और महत्त्व

श्रीब्रह्मवैवर्त-पुराण के प्रकृतिखण्ड, अध्याय ४ में मुनिवर भगवान् नारायण ने मुनिवर नारदजी को बतलाया कि ‘विप्रेन्द्र ! सरस्वती का कवच विश्व पर विजय प्राप्त कराने वाला है। जगत्स्त्रष्टा ब्रह्मा ने गन्धमादन पर्वत पर भृगु के आग्रह से इसे इन्हें बताया था।

विश्वविजय सरस्वती कवच अर्थ महत्त्व

।।ब्रह्मोवाच।।
श्रृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम्। श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम्।।
उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वमे। रासेश्वरेण विभुना वै रासमण्डले।।
अतीव गोपनीयं च कल्पवृक्षसमं परम्। अश्रुताद्भुतमन्त्राणां समूहैश्च समन्वितम्।।
यद् धृत्वा भगवाञ्छुक्रः सर्वदैत्येषु पूजितः। यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मन् बुद्धिमांश्च बृहस्पति।।
पठणाद्धारणाद्वाग्मी कवीन्द्रो वाल्मिको मुनिः। स्वायम्भुवो मनुश्चैव यद् धृत्वा सर्वपूजितः।।
कणादो गौतमः कण्वः पाणिनीः शाकटायनः। ग्रन्थं चकार यद् धृत्वा दक्षः कात्यायनः स्वयम्।।
धृत्वा वेदविभागं च पुराणान्यखिलानि च। चकार लीलामात्रेण कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।।
शातातपश्च संवर्तो वसिष्ठश्च पराशरः। यद् धृत्वा पठनाद् ग्रन्थं याज्ञवल्क्यश्चकार सः।।
ऋष्यश्रृंगो भरद्वाजश्चास्तीको देवलस्तथा। जैगीषव्योऽथ जाबालिर्यद् धृत्वा सर्वपूजिताः।।
कचवस्यास्य विप्रेन्द्र ऋषिरेष प्रजापतिः। स्वयं च बृहतीच्छन्दो देवता शारदाम्बिका।।१
सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थसाधनेषु च। कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः।।२
श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः। श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदावतु।।३
ॐ सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रे पातु निरन्तरम्। ॐ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु।।४
ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोऽवतु। ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदावतु।।५
ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहेति दन्तपङ्क्तीः सदावतु। ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु।।६
ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे श्रीं सदावतु। ॐ श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदावतु।।७
ॐ ह्रीं विद्यास्वरुपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्। ॐ ह्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहेति मम हस्तौ सदावतु।।८
ॐ सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदावतु। ॐ वागधिष्ठातृदेव्यै सर्व सदावतु।।९
ॐ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदावतु। ॐ ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशि रक्षतु।।१०
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा। सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदावतु।।११
ऐं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैर्ऋत्यां मे सदावतु। कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु।।१२
ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु। ॐ ऐं श्रीं गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु।।१३
ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदावतु। ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदावतु।।१४
ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु। ॐ ग्रन्थबीजरुपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु।।१५

इति ते कथितं विप्र ब्रह्ममन्त्रौघविग्रहम्। इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मरुपकम्।।
पुरा श्रुतं धर्मवक्त्रात् पर्वते गन्धमादने। तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्।।
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद् वस्त्रालंकारचन्दनैः। प्रणम्य दण्डवद् भूमौ कवचं धारयेत् सुधीः।।
पञ्चलक्षजपैनैव सिद्धं तु कवचं भवेत्। यदि स्यात् सिद्धकवचो बृहस्पतिसमो भवेत्।।
महावाग्मी कवीन्द्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत्। शक्नोति सर्वे जेतुं स कवचस्य प्रसादतः।।
इदं ते काण्वशाखोक्तं कथितं कवचं मुने। स्तोत्रं पूजाविधानं च ध्यानं वै वन्दनं तथा।।
।।इति श्रीब्रह्मवैवर्ते ध्यानमन्त्रसहितं विश्वविजय-सरस्वतीकवचं सम्पूर्णम्।।
(प्रकृतिखण्ड ४।६३-९१)
भावार्थः-

विश्वविजय सरस्वती कवच Saraswati Kavacham with Lyrics | Mantra for Memory, Education & Knowledge

ब्रह्माजी बोले - वत्स ! मैं सम्पूर्ण कामना पूर्ण करने वाला कवच कहता हूँ, सुनो ! यह श्रुतियों का सार, कान के लिये सुखप्रद, वेदों में प्रतिपादित एवं उनसे अनुमादित है। रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण गोलोक में विराजमान थे। वहीं वृन्दावन में रासमण्डल था। रास के अवसर पर उन प्रभु ने मुझे यह कवच सुनाया था।

कल्प-वृक्ष की तुलना करने वाला यह कवच परम गोपनीय है। जिन्हें किसी ने नहीं सुना, वे अद्भुत मन्त्र इसमें सम्मिलित हैं। इसे धारण करने के प्रभाव से ही भगवान् शुक्राचार्य सम्पूर्ण दैत्यों के पूज्य बन सके। ब्रह्मन् ! बृहस्पति में इतनी बुद्धि का समावेश इस कवच की महिमा से ही हुआ है। वाल्मीकि मुनि सदा इसका पाठ और सरस्वती का ध्यान करते हैं। अतः उन्हें कवीन्द्र कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हो गया। वे भाषण करने में परम चतुर हो गये। इसे धारण करके स्वायम्भुव मनु ने सबसे पूजा प्राप्त की। कणाद, गौतम, कण्व, पाणिनी, शाकटायन, दक्ष और कात्यायन – इस कवच को धारण करके ही ग्रन्थों की रचना में सफल हुए। इसे धारण करके स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यासदेव ने वेदों का प्रणयन किया। शातातप, संवर्त, वशिष्ठ, पराशर, याज्ञवल्क्य, ऋष्यश्रृंग, भारद्वाज, आस्तीक, देवल, जैगीषव्य और जाबालि ने इस कवच को धारण करके सबमें पूजित हो ग्रन्थों की रचना की थी।
 
सुंदर भजन में विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के कवच का अत्यंत प्रभावशाली उदगार प्रकट हुआ है। यह कवच सभी प्रकार की विद्या, वाणी एवं बुद्धि को विकसित करने वाला है और साधक को त्रैलोक्य में सम्मान दिलाने की क्षमता रखता है।

इसमें सरस्वती देवी के दिव्य स्वरूप का उल्लेख हुआ है—वे ज्ञान की संरक्षिका, वाणी की दात्री और वेदों की अधिष्ठात्री हैं। उनका कवच धारण करने से साधक को वाक्पटुता, विद्वत्ता, लेखन-कौशल एवं दार्शनिक चिन्तन में श्रेष्ठता प्राप्त होती है। इसे धारण करने से महर्षि वाल्मीकि ने महान ग्रंथों की रचना की, बृहस्पति अद्वितीय बुद्धिमान बने, और वेदों के ज्ञाता व्यासदेव ने वेदों का सम्पादन किया।

उदगार स्वरूप यह भजन प्रदर्शित करता है कि यह कवच धारण करने से व्यक्ति की वाणी में प्रखरता आती है, तर्कशक्ति विकसित होती है और ज्ञान में गहराई आती है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति को कवित्व, लेखन-शक्ति और विद्वत्ता प्राप्त होती है। यह उन साधकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो अध्ययन, ज्ञान और वाक्शक्ति में उन्नति चाहते हैं। 

माँ सरस्वती विद्या, बुद्धि, और वाक्पटुता की अधिष्ठात्री देवी की कृपा से साधक को त्रैलोक्य में सम्मान और सिद्धि प्रदान करती है। यह कवच मंत्रों का समूह है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने गोलोक में ब्रह्मा जी को रासमंडल में उपदेशित किया था। यह कवच वेदों का सार है, जो साधक को कवित्व, लेखन, और दार्शनिक चिंतन में श्रेष्ठता प्रदान करता है, जैसा कि शुक्राचार्य, बृहस्पति, वाल्मीकि, और व्यास जैसे महान ऋषियों ने इसके प्रभाव से प्राप्त किया।
माँ सरस्वती का यह कवच साधक के जीवन को ज्ञान और वाणी की ज्योति से आलोकित करता है, जिससे वह न केवल बुद्धि और विद्या में निपुण होता है, बल्कि तीनों लोकों में उसकी कीर्ति गूँजती है। इस कवच को धारण करने से साधक की वाणी में प्रखरता, तर्कशक्ति में गहराई, और लेखन में चातुर्य आता है। यह साधकों को उनके कार्यों में सफलता और सम्मान दिलाता है, जैसा कि स्वायम्भुव मनु, कणाद, गौतम, और अन्य महर्षियों ने अनुभव किया। इसकी सिद्धि के लिए पंचलक्ष जप करने से साधक बृहस्पति के समान बुद्धिमान और कवीन्द्र के समान वाक्पटु बनता है। यह कवच साधक को सभी दिशाओं में रक्षा प्रदान करता है और उसे हर कठिन कार्य में विजय दिलाता है। अतः, जो साधक इस कवच को श्रद्धा और विधि-विधान से धारण करता है, वह माँ सरस्वती की कृपा से ज्ञान, विद्या, और यश का पात्र बनता है, जिससे उसका जीवन विश्व में विजयी और सार्थक हो जाता है।
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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