कबीर के इन दोहों को अर्थ सहित

कबीर के इन दोहों को अर्थ सहित जान लीजिये

 
कबीर के दोहे हिंदी में Kabir Dohe in Hindi कबीर दास के दोहे हिन्दी

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 
 
जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल। तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
अर्थ: यदि कोई आपके लिए कांटे बोता है, तो आप उसके लिए फूल बोइए। आपके फूल उसे सुख देंगे, लेकिन उसके कांटे अंततः उसी को कष्ट पहुंचाएंगे।

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास। तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥
अर्थ: प्रेम का प्रतीक बगुला प्रेम के तिनके को लेकर आकाश की ओर उड़ता है। तिनका तिनके से मिलकर प्रेमियों को एक-दूसरे के पास लाता है।

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ। धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥
अर्थ: यदि सातों समुद्रों को स्याही बना लें, सभी वनों की लकड़ियों को कलम और पूरी धरती को कागज, तब भी भगवान के गुणों को पूर्णतः नहीं लिखा जा सकता।

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय। आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥
अर्थ: सच्चा साधु धन-संपत्ति का संचय नहीं करता, केवल उतना ही ग्रहण करता है जितना पेट भरने के लिए आवश्यक हो। भगवान हर समय उसके साथ होते हैं, इसलिए जब भी आवश्यकता होती है, वह निर्भय होकर मांग लेता है।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर॥
अर्थ: हाथ में माला फेरते हुए युग बीत गए, लेकिन मन का भाव नहीं बदला। हाथ की माला को छोड़कर मन के मोतियों को बदलो, अर्थात् बाहरी दिखावे को छोड़कर मन को शुद्ध करो।

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट। पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट॥
अर्थ: यदि संभव हो तो राम के नाम का लाभ अभी ले लो। बाद में, जब प्राण निकल जाएंगे, तो पछताना पड़ेगा कि भगवान का स्मरण क्यों नहीं किया।

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप। जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप॥
अर्थ: जहां दया होती है, वहां धर्म होता है; जहां लोभ होता है, वहां पाप होता है। जहां क्रोध होता है, वहां भी पाप होता है; और जहां क्षमा होती है, वहां ईश्वर स्वयं विराजते हैं।
 
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