माटी में मिले माटी पानी में पानी भजन
अरे अभिमानी अरे अभिमानी,
पानी का बुलबला जैसा तेरी ज़िंदगानी,
अरे अभिमानी, अरे अभिमानी।
भाई बंध तेरे काम ना आवे,
कुटुंब कबीला तेरे साथ ना जावे,
संग ना चलेंगे तेरे कोई भी प्राणी,
अरे अभिमानी, अरे अभिमानी।
रही ना निशानी राजा वजीरों की,
इक इक ठाठ जिनके लाख लाख हीरो की,
ढाई ग़ज कपड़ा डोली पड़ेगी उठानी,
अरे अभिमानी, अरे अभिमानी।
खाना और पीना तो पशुओं का काम है,
दो घडी सत्संग न किया करता अभिमान है,
बीती जाये यु ही तेरी ज़िंदगानी,
अरे अभिमानी, अरे अभिमानी।
करले भलाई जग में काम तेरे आएगी,
जायेगा जहां से जब साथ तेरे जायेगे,
कहे बिंदु शर्मा अपनी छोटी सी कहानी,
अरे अभिमानी, अरे अभिमानी।
माटी में मिले माटी पानी में पानी,
अरे अभिमानी अरे अभिमानी,
पानी का बुलबला जैसा तेरी ज़िंदगानी,
अरे अभिमानी, अरे अभिमानी।
भकत रामनिवास चेतावनी शब्द mati mein milye mati pani mein pani
सब कुछ मिटने वाला है, केवल कर्म और भलाई ही साथ जाने वाली है। यह पुकार है उन मनों के लिए जो धन, पद या यश के अहंकार में उलझकर यह भूल जाते हैं कि अंत में वही माटी है, जिससे बने हैं, और उसी में विलीन होना है। मिट्टी और पानी की यह तुलना मनुष्य को उसकी वास्तविकता का बोध कराती है—कि वह स्वयं क्षणभंगुर है, और जीवन का श्रृंगार केवल अच्छे कर्मों से होता है। अभिमान चाहे कितना भी ऊँचा क्यों न हो, समय के शिकंजे में वह एक बुलबुले की तरह फूट जाता है।
जब मनुष्य जीवन को केवल भोग और अधिकार के लिए जीता है, तो उसकी आत्मा धीरे-धीरे थक जाती है। परंतु जब वही मन अच्छा करने, दूसरों के हित में सोचने लगता है, तब उसके अस्तित्व को अर्थ मिल जाता है। यह गीत याद दिलाता है कि धर्म केवल पूजा या आचार का विषय नहीं, बल्कि आचरण में विनम्रता और कर्म में करुणा का भाव है। अंततः जो मन भलाई में रम गया, वही मृत्यु के पार भी मुस्कुराता है। यहाँ “अरे अभिमानी” एक तिरस्कार नहीं, चेतावनी है—कि संभल जा, जीवन क्षणिक है, पर तू चाह ले तो इसी पल को अमर बना सकता
भकत राम निवास की आवाज मैं चेतावनी शब्द, संतो के शब्द , मीरा बाई के शब्द , संत कबीर के शब्द , देखने व सुनने के लिए superline Audio चैनल को subscribe करें।
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