भोली मारी आत्मा रे काची केहडली रे

भोली मारी आत्मा रे काची केहडली रे


भोळी म्हारी आत्मा रे,
काची केहड़ली रे,
ईश्वर भजियो रा
फल-भाल रे भाई।

कोईक हाले हस्थी-घोड़ा,
कोई ऊँटे असवार,
कोईक हाले पाले पगले,
कनी माथे है भार।
भोळी म्हारी आत्मा रे,
काची केहड़ली रे,
ईश्वर भजियो रा
फल-भाल रे भाई।

कोईक जीमे सिरा लापसी,
कोई चावल भात,
कोईक जीमे तोंदला रे,
कोई नरना काटे रात।
भोळी म्हारी आत्मा रे,
काची केहड़ली रे,
ईश्वर भजियो रा
फल-भाल रे भाई।

कोईक पोंडे हिगले ढोलिये,
कोई हिंडोले खाट,
कोईक हुवे हाथरे,
कोई भमता काटे रात।
भोळी म्हारी आत्मा रे,
काची केहड़ली रे,
ईश्वर भजियो रा
फल-भाल रे भाई।

कनी है रे पाँच पुतर,
कनी ऐका एक,
कोईक जुग में वोजिया,
जनौरी मालिक राखे टेक।
भोळी म्हारी आत्मा रे,
काची केहड़ली रे,
ईश्वर भजियो रा
फल-भाल रे भाई।

नमो निरंजन नाथ ने,
म्हारे आत्म रा आधार,
अनदोजी सोनी बोलिया,
हरभज उतरो पार।
भोळी म्हारी आत्मा रे,
काची केहड़ली रे,
ईश्वर भजियो रा
फल-भाल रे भाई।



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आत्मा की सादगी और निश्छलता ही उसे प्रभु के करीब ले जाती है। संसार में कोई धन-दौलत, वैभव या सुख-सुविधाओं के पीछे भागता है, पर सच्चा सुख तो ईश्वर की भक्ति में ही मिलता है। जीवन में चाहे सादा भोजन हो या शाही ठाठ, चाहे पैदल चलना पड़े या सवारी मिले, सब कुछ नश्वर है। प्रभु का भजन करने से ही मन को शांति और जीवन को सार्थकता मिलती है। उनकी कृपा से आत्मा का बोझ हल्का होता है, और वह भवसागर से पार उतर जाती है।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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