अपने करम की गति मैं क्या जानूँ भजन

अपने करम की गति मैं क्या जानूँ

अपने करम की गति मैं क्या जानूँ, मैं क्या जानूँ बाबा रे ।
नर मरै किछु काम न आवे, पसु मरै दस काज संवारे ।
अपने करम की गति मैं क्या जानूँ, मैं क्या जानूँ बाबा रे
हाड़ जलै जैसे लकड़ी का तूला, केस जलै जैसे गास का पूला ।
अपने करम की गति मैं क्या जानूँ, मैं क्या जानूँ बाबा रे
कहै कबीर तब ही नर जागै, जम का ड़ंड़ मुंड़ में लागै ।
अपने करम की गति मैं क्या जानूँ, मैं क्या जानूँ बाबा रे 
 
"अपने करम की गति मैं क्या जानूँ, मैं क्या जानूँ बाबा रे"
कबीरदास जी कहते हैं कि वे अपने कर्मों के परिणामों को नहीं जानते; यह स्वीकारोक्ति मानव की सीमित समझ को दर्शाती है।

"नर मरै किछु काम न आवे, पसु मरै दस काज संवारे"
मनुष्य की मृत्यु पर उसका शरीर किसी उपयोग का नहीं रहता, जबकि पशु की मृत्यु पर उसका शरीर कई कार्यों में आता है, जैसे दूध, चमड़ा आदि।

"हाड़ जलै जैसे लकड़ी का तूला, केस जलै जैसे गास का पूला"
मनुष्य की हड्डियाँ जलने पर लकड़ी की तरह और बाल घास की तरह जलते हैं, जो शरीर की क्षणभंगुरता को दर्शाता है।

"कहै कबीर तब ही नर जागै, जम का डंड मुंड में लागै"
कबीर कहते हैं कि मनुष्य तब ही जागरूक होता है जब यमराज का दंड उसके सिर पर पड़ता है, अर्थात मृत्यु निकट होती है।

Apne karam ki gati

संत कबीर दास जी का यह भजन "अपने करम की गति मैं क्या जानूँ" भक्ति साहित्य की एक गहन रचना है, जो मानव जीवन की अनिश्चितता, कर्मों की गति और मृत्यु की सच्चाई पर प्रकाश डालता है। कबीर जी, जो 15वीं शताब्दी के निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख संत थे, अपनी सरल भाषा में गहन दार्शनिक सत्य व्यक्त करते हैं। इस भजन में वे कहते हैं कि मनुष्य अपने कर्मों की गति को नहीं समझ सकता, और मृत्यु के समय कुछ भी साथ नहीं जाता। उदाहरणस्वरूप, "नर मरै किछु काम न आवे, पसु मरै दस काज संवारे" का अर्थ है कि मनुष्य की मृत्यु व्यर्थ जाती है, जबकि पशु की मृत्यु से कई उपयोगी चीजें प्राप्त होती हैं जैसे चमड़ा, हड्डियाँ आदि। इसी प्रकार, "हाड़ जलै जैसे लकड़ी का तूला, केस जलै जैसे गास का पूला" में कबीर जी शरीर की नश्वरता को दर्शाते हैं, जहां हड्डियाँ लकड़ी की तरह जलती हैं और बाल घास की तरह। यह भजन पूर्ण समर्पण और ईश्वर भक्ति का संदेश देता है, जहां भक्त अपनी अज्ञानता स्वीकार कर प्रभु पर छोड़ देता है।


कबीर जी के इस भजन का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को आध्यात्मिक जागृति की ओर प्रेरित करना है। वे कहते हैं, "कहै कबीर तब ही नर जागै, जम का ड़ंड़ मुंड़ में लागै" अर्थात् कबीर कहते हैं कि मनुष्य तब जागता है जब मौत का डंडा सिर पर लगता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह भजन गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल है और विभिन्न कलाकारों जैसे भाई हरजिंदर सिंह, भाई निरंजन सिंह द्वारा गाया जाता रहा है। कबीर जी की रचनाएँ हिंदू-मुस्लिम दोनों की रूढ़ियों की आलोचना करती हैं और सच्ची भक्ति पर जोर देती हैं। यह भजन आज भी लोकप्रिय है, जो जीवन की क्षणभंगुरता सिखाता है और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की प्रेरणा देता है, जैसा कि विभिन्न स्रोतों में वर्णित है।

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