पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ ढाई आखर प्रेम मीनिंग
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ ढाई आखर प्रेम मीनिंग
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
या
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
एकै अखिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
या
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
एकै अखिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
Pothee Padhi Padhi Jag Mua, Pandit Bhaya Na Koy,
Dhaee Aakhar Prem Ka, Padhe So Pandit Hoy.
Ya
Pothee Padhi Padhi Jag Muva, Pandit Bhaya Na Koi.
Ekai Akhir Peev Ka, Padhai Su Pandit Hoi.
Dhaee Aakhar Prem Ka, Padhe So Pandit Hoy.
Ya
Pothee Padhi Padhi Jag Muva, Pandit Bhaya Na Koi.
Ekai Akhir Peev Ka, Padhai Su Pandit Hoi.
दोहे के हिंदी शब्दार्थ
पंडित : ज्ञानी, निपुण مہارت مند
भया : हुआ ہوا
ढाई आखर : ढाई अक्षर خط
प्रेम : मानवीय सद्भावना پریم
इस दोहे का हिंदी मीनिंग
व्यावहारिक ज्ञान किताबी ज्ञान से बढ़कर होता है। पंडित से यहाँ अभिप्राय "ज्ञाता-निपुण" से लिया गया है, किसी जाती विशेष से नहीं। किताबी ज्ञान का रट्टा मार कर कई "किताबी विद्वान्" अवश्य हो गए और इस संसार से चले गए, लेकिन उन्होंने व्यावहारिक ज्ञान को प्राप्त ही नहीं किया। मानवता का मूल स्तम्भ है 'एक दुसरे के प्रति आदर भाव और प्रेम भाव' .
इनके अभाव में मात्र किताबी ज्ञान का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। ऐसा नहीं है की किताबी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है, है लेकिन यदि मानवीय गुण का अभाव है तो किताबी ज्ञान कुछ भला नहीं कर सकता है। जिसने भी ढाई अक्षर 'प्रेम' के पढ़ लिए वही 'पंडित' कहलाया है। ऐसे कई उदाहरन देखने को मिलते हैं जहाँ व्यक्ति किताबी ज्ञान में तो श्रेष्ठ होता है लेकिन उसमे चारित्रिक गुणों का अभाव होने के कारण उसका ज्ञान जन हितकारी और लोक कल्याणकारी नहीं बन पाता है और उसे साथ ही उसका ज्ञान चला जाता है।
जिसे वेद का ज्ञान नहीं है, शास्त्र का ज्ञान नहीं है कोई बात नहीं, यदि आप प्रेम को जानते हैं तो आप भी पंडित हैं, यह है कबीर साहेब की अलौकिक वाणी। प्रेम से जीना, प्रेम को निभाना, प्रेम देना नहीं सीखा तो जीवन अधुरा है। जीवन का प्रत्येक कार्य प्रेम के साथ किया जाना ही वास्तविक कला है। इस दोहे का मूल भाव व्यक्ति के चारित्रिक गुणों का व्यावहारिक धरातल पर उकेरना है।
वर्तमान में आज हमारे पास सभी सुख सुविधाएं हैं, लेकिन प्रेम की कमी है। हमें 'माया' के दीगर किसी से प्रेम नहीं है। जीवन की खुशियां आती हैं और चली जाती है, उन्हें महसूस करने की शक्ति नहीं है क्यों की प्रेम नहीं है। जहाँ प्रेम है, वहीँ सम्पन्नता और वैभव है, वैभव और सम्पन्नता से प्रेम पैदा नहीं होता है, यह हमारी समझ का अभाव है। आप जो भी कार्य व्यवहार करे, प्रेम के साथ करें तो सभी समस्याएं समाप्त होती चली जाएँगी।
किताबी ज्ञान को प्राप्त करके जगत मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं, वे वास्तविक ग्यानी नहीं हैं, ढाई अक्षर प्रेम का पढ़ कर व्यक्ति वास्तविक ज्ञानी बन सकता है. कबीर के इस दोहे का अर्थ है कि ज्ञान केवल पुस्तकों से प्राप्त नहीं होता है. ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत प्रेम है. जो लोग प्रेम को समझते हैं, वे ही वास्तव में ज्ञानी हैं. कबीर कहते हैं कि बहुत से लोग पुस्तकों को पढ़ते हैं, कंठस्थ करते हैं, लेकिन वे सच्चे ज्ञान को प्राप्त नहीं कर पाते हैं. वे केवल पुस्तकों से तथ्यों को सीखते हैं, लेकिन वे प्रेम को नहीं समझ पाते हैं. प्रेम ही वह ज्ञान है जो हमें जीवन का वास्तविक अर्थ समझाता है. प्रेम ही हमें दूसरों के साथ जुड़ने और एकता का अनुभव करने में मदद करता है. प्रेम ही हमें शांति और आनंद देता है.
कबीर साहेब की वाणी है की किताबी ज्ञान को हासिल, करके, विभिन्न पुस्तकों को पढ़कर जगत विनाश को प्राप्त हो रहा है, उसका कल्याण नहीं हो पारा है. किताबी ज्ञान से कोई भी पंडित (ज्ञानी) नहीं बन पाया है. असली ज्ञानी बनाने के लिए प्रेम (आत्मिक रूप से ), करुना, और मानवता को ग्रहण करना होता है. कबीर साहेब, के अनुसार जिसने ढाई अक्षर प्रेम के पढ़ लिए वही ज्ञानी है. कबीर साहेब के दोहे "पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय" इस बात को बखूबी समझाते हैं. इस दोहे में कबीर साहेब कहते हैं कि लोग किताबों के ज्ञान से भर गए हैं, लेकिन वे ज्ञानी नहीं हुए हैं. वे कहते हैं कि जो लोग प्रेम के ढाई अक्षर समझ गए हैं, वही लोग वास्तव में ज्ञानी हैं.
कबीर साहेब की वाणी है की किताबी ज्ञान को हासिल, करके, विभिन्न पुस्तकों को पढ़कर जगत विनाश को प्राप्त हो रहा है, उसका कल्याण नहीं हो पारा है. किताबी ज्ञान से कोई भी पंडित (ज्ञानी) नहीं बन पाया है. असली ज्ञानी बनाने के लिए प्रेम (आत्मिक रूप से ), करुना, और मानवता को ग्रहण करना होता है. कबीर साहेब, के अनुसार जिसने ढाई अक्षर प्रेम के पढ़ लिए वही ज्ञानी है. कबीर साहेब के दोहे "पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय" इस बात को बखूबी समझाते हैं. इस दोहे में कबीर साहेब कहते हैं कि लोग किताबों के ज्ञान से भर गए हैं, लेकिन वे ज्ञानी नहीं हुए हैं. वे कहते हैं कि जो लोग प्रेम के ढाई अक्षर समझ गए हैं, वही लोग वास्तव में ज्ञानी हैं.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा : किताबों को पढ़ पढ़ कर जगत मर गया, विनाश को प्राप्त हुआ.
पंडित भया न कोइ : कोई भी पंडित नहीं बना, कोई भी तत्वज्ञानी नहीं बन पाया.
एकै आषिर पीव का : एक अक्षर इश्वर का.
पढ़ै सु पंडित होइ : जो पढ़ ले वही पंडित बन पाता है.
पोथी : किताब/पुस्तकें, यहाँ पर शास्त्रों से अर्थ है.
पढ़ि पढ़ि : पढ़ पढ़ कर.
जग मुवा : जगत नाश हुआ, मर गया.
पंडित : ज्ञानी, तत्व का ज्ञान रखने वाला.
भया न कोइ : कोई नहीं हुआ (ज्ञानी कोई नहीं बन पाया है)
एकै आषिर : एक अक्षर.
पीव का : प्रिय का, इश्वर का.
पढ़ै सु : पढ़े वही.
पंडित होइ : पंडित (ज्ञानी) बन पाता है.
कबीर साहेब की वाणी है की पोथी पढ़ पढ़ कर जगत मर गया है, विनाश को प्राप्त हुआ है. महज किताबी ज्ञान, शास्त्रीय ज्ञान से इश्वर की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती है. समस्त किताबों के स्थान पर एक अक्षर इश्वर का (प्रेम का ) पढ़ लेने से जीवात्मा का कल्याण संभव होता है.
कबीर साहेब ने प्रचलित शास्त्रीय भक्ति के स्थान पर हृदय से भक्ति करने पर जोर दिया जिसमें किसी कर्मकांड, आडम्बर की जगह नहीं है. हृदय से इश्वर की भक्ति करने पर अवश्य ही इश्वर की प्राप्ति होती है. हृदय से इश्वर के नाम का सुमिरन ही मुक्ति का मार्ग है. किताबी ज्ञान से कोई तत्वज्ञानी नहीं बन पाता है. तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए नाम सुमिरण महत्त्व रखता है.
पंडित भया न कोइ : कोई भी पंडित नहीं बना, कोई भी तत्वज्ञानी नहीं बन पाया.
एकै आषिर पीव का : एक अक्षर इश्वर का.
पढ़ै सु पंडित होइ : जो पढ़ ले वही पंडित बन पाता है.
पोथी : किताब/पुस्तकें, यहाँ पर शास्त्रों से अर्थ है.
पढ़ि पढ़ि : पढ़ पढ़ कर.
जग मुवा : जगत नाश हुआ, मर गया.
पंडित : ज्ञानी, तत्व का ज्ञान रखने वाला.
भया न कोइ : कोई नहीं हुआ (ज्ञानी कोई नहीं बन पाया है)
एकै आषिर : एक अक्षर.
पीव का : प्रिय का, इश्वर का.
पढ़ै सु : पढ़े वही.
पंडित होइ : पंडित (ज्ञानी) बन पाता है.
कबीर साहेब की वाणी है की पोथी पढ़ पढ़ कर जगत मर गया है, विनाश को प्राप्त हुआ है. महज किताबी ज्ञान, शास्त्रीय ज्ञान से इश्वर की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती है. समस्त किताबों के स्थान पर एक अक्षर इश्वर का (प्रेम का ) पढ़ लेने से जीवात्मा का कल्याण संभव होता है.
कबीर साहेब ने प्रचलित शास्त्रीय भक्ति के स्थान पर हृदय से भक्ति करने पर जोर दिया जिसमें किसी कर्मकांड, आडम्बर की जगह नहीं है. हृदय से इश्वर की भक्ति करने पर अवश्य ही इश्वर की प्राप्ति होती है. हृदय से इश्वर के नाम का सुमिरन ही मुक्ति का मार्ग है. किताबी ज्ञान से कोई तत्वज्ञानी नहीं बन पाता है. तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए नाम सुमिरण महत्त्व रखता है.
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