गोंविदो गायो नहीं भजन Govindo Gayo Nahi Lyrics
राम भजन भजियो नहीं, नहीं कियो हरि सूं हेत
अब पछताया क्या हुए, जब चिड़िया चुग गयी खेत
चिड़िया चुग गयी खेत, लारे अब रेत रही
राम भजन भजियो नहीं, तो संतां साच कही
गोंविदो गायो नहीं तूने क्या कमायो बांवरे
अहरण की चोरी करी रे, कियो सुई को दान रे
चढ़ चौबारे झांक रियो तू, अभी न आयो मान रे
हिन्दु होकर पीपल काटे, खर्च कन्या को खाए रे
मुस्लिम होकर ब्याज कमावे, जड़ा मूल से जाए रे
गंगा तू न्हायो गोमती रे, चढ़यो तू गढ़ गिगनार रे
बणजारे रे बैल ताईं थारो, गयो जमारो हार रे
बैठ पत्थर की नाव बणाई, छोड़ी जल के बीच रे
कहत कबीर सुणो भाई साधो, डूबेला मझधार रे
यह भजन हमें जीवन की क्षणभंगुरता और समय रहते ईश्वर-भक्ति की महत्ता का बोध कराता है। कबीरदास जी कहते हैं कि तुमने राम का भजन नहीं किया और न ही हरि से प्रेम स्थापित किया। अब पछताने से क्या लाभ, जब चिड़िया खेत चुग गई—अर्थात्, समय निकल चुका है। तुमने सांसारिक कार्यों में लिप्त रहकर धर्म-कर्म की उपेक्षा की, जैसे लोहार ने चोरी की और दिखावे के लिए सुई का दान किया। हिन्दू होकर पीपल का वृक्ष काटा और मुस्लिम होकर ब्याज कमाया, जिससे मूल धर्म से भटक गए। गंगा और गोमती में स्नान किया, तीर्थ यात्राएँ कीं, परंतु आत्मिक शुद्धि नहीं की। पत्थर की नाव बनाकर जल में उतारी, जो निश्चित ही डूब जाएगी। कबीर कहते हैं, हे साधु, समय रहते चेत जाओ, अन्यथा जीवन-मध्य में ही डूब जाओगे।
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