उल्टा बाण गगन मांय लाग्या कबीर भजन

उल्टा बाण गगन मांय लाग्या कबीर भजन

उल्टा बाण गगन मांय लाग्या Ulata Baan Gagan May Lagya Lyrics Mooralal Marwada

उल्टा बाण गगन मांय लाग्या,
भाया ऊंवा वसे एक देही
उस देही मां अलख विराजे,
लवना लागी मेरी, मेरा साधू रे
तम देखो साहिब केरी लहरी
सतगुरु शबदां सूं हेरी, मेरा साधू रे
तम देखो साहिब केरी लहरी
इस देही मांय तरवर उगा,
पान ना फूल नहीं केरी
रूप नहीं मेरी छाया नहीं,
फल लगा दो केरी, मेरा साधू रे
तम देखो साहिब केरी लहरी
इस देही मांय बाजा रे वागे,
भाया, वागे रे आठों पहरी
ताल पखावज मृदंग वागे,
ने बांसुरी वागे गहरी
तम देखो साहिब केरी लहरी

इस देही मांय सात साहेरिया,
नवाणू सौ नदियाँ गहरी
आंगतिया पांगतिया रत्नागर सागर,
बीच में अमीरस भेरी, मेरा साधू रे
तम देखो साहिब केरी लहरी
अगम अगोचर निर्भय कीन्हा भाया,
नहीं जानूं ग़म गहरी
साहिब कबीर कहे सुनो मेरा साधो,
मैं निर्गुण माला फेरी, मेरा साधू रे
तम देखो साहिब केरी लहरी


'Ulta Baan' by Mooralala Marwada

आकाश की ओर उल्टा तीर उड़ गया! अजब चमत्कार हो गए। पत्ते-फूल-फल के बिना वृक्ष उग आया। बाजा रुक-रुक कर न बजता रहा। सागर के बीच में मीठे पानी का तालाब प्रकट हो गया। कबीर शायद अपनी आध्यात्मिक यात्रा को कई रूपकों से बता रहे हैं, जो निराकार अनुभव को रूप दे रहे हैं। मोरलाला की झूमदार प्रस्तुति पूरे भजन में आनंद की विशेषता लाती है!

Vocals & Tambura: Mooralala Marwada
Dholak: Parbat Jogi
Ghada Ghamela: Dana Bharmal
Manjiras: Shukriya Naru & Sukhdev 

यह कबीर दास जी का सुंदर निर्गुण भजन है, जो आध्यात्मिक अनुभव को उलटे-सीधे चमत्कारों के रूपकों से बयान करता है। शरीर (देही) को आकाश, वृक्ष, बाजा और सागर जैसे प्रतीकों से दर्शाया गया है, जो परमात्मा के अलौकिक रहस्यों को प्रकट करते हैं। 

उल्टा बाण गगन में लाग्या, भाया ऊंवा वसे एक देही। उस देही में अलख विराजे, लवना लागी मेरी, मेरा साधू रे।
आकाश की ओर उल्टा बाण चला गया! अजब संयोग से एक ही देह में ऊपर का चमत्कार बस गया। उस देह में ही अनदेखा-अलख परमात्मा विराजमान है। हे मेरे साधु, यह तो प्रभु की लहर (चमत्कार) ही देखो!

तम देखो साहिब केरी लहरी। सतगुरु शब्दों सूं हेरी, मेरा साधू रे। तम देखो साहिब केरी लहरी।
यह सब सतगुरु के शब्दों से ही प्रकट हुआ। हे साधु, साहिब की यह लहर देखो!

इस देही में तरवर उगा, पान ना फूल नहीं केरी। रूप नहीं मेरी छाया नहीं, फल लगा दो केरी, मेरा साधू रे। तम देखो साहिब केरी लहरी।
इस देह में एक वृक्ष उग आया, बिना पत्ते, फूल या रूप के। न छाया है, न साया, फिर भी दो फल लगा दो! हे साधु, प्रभु की लहर देखो!

इस देही में बाजा रे वागे, भाया, वागे रे आठों पहरी। ताल पखावाज मृदंग वागे, ने बांसुरी वागे गहरी। तम देखो साहिब केरी लहरी।
इस देह में बाजे बजने लगे, भाया, चौबीसों घंटे बजते रहते हैं। ताल, पखावज, मृदंग और गहरी बांसुरी सब गूंज रही हैं। हे साधु, साहिब की लहर देखो!

इस देही में सात साहेरिया, नवाणू सौ नदियाँ गहरी। आंगतिया पांगतिया रत्नागर सागर, बीच में अमीरस भेरी, मेरा साधू रे। तम देखो साहिब केरी लहरी। इस देह में सात तालाब, नौ सौ गहरी नदियाँ हैं। आकृतियाँ-पिंड रत्नों का सागर बने, बीच में अमृत का रस बह रहा है। हे साधु, प्रभु की लहर देखो!

अगम अगोचर निर्भय कीन्हा भाया, नहीं जानूं घम गहरी। साहिब कबीर कहे सुनो मेरा साधो, मैं निर्गुण माला फेरी, मेरा साधू रे। तम देखो साहिब केरी लहरी। अगम-अगोचर (पहुँच से परे) निर्भय भाव से भाया ने कर दिखाया, गहन रहस्य को न जानूँ। कबीर कहते हैं, सुनो हे साधो, मैं निर्गुण भक्ति की माला फेर रहा हूँ। हे साधु, साहिब की लहर देखो! कबीर जी अपनी देह को आध्यात्मिक चमत्कारों का खजाना बताते हैं—जहाँ उल्टे बाण उड़ते हैं, फलहीन वृक्ष फल देते हैं, बाजे स्वतः बजते हैं, और सागर के बीच अमृत झलकता है। यह निर्गुण भक्ति का वर्णन है, जो सतगुरु के शब्दों से जागृत होता है। मोरलाला मारवाड़ा की प्रस्तुति में यह भजन आनंदमय लगता है, जो कच्छ के लोक-संगीत की परंपरा को जीवंत करता है। 

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