दूर नगरी बड़ी दूर नगरी कैसे आऊँ भजन
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी कैसे आऊँ भजन
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
कैसे आऊँ मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
कैसे आऊं मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
रात को आऊँ, कान्हा डर मोहे लागे,
दिन को आऊँ तो, देखें सारी नगरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
सखी संग आऊँ कान्हा, शर्म मोहे लागे,
अकेली आऊँ तो भूल, जाऊ डगरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
धीरे धीरे चलूँ तो, क़मर मोरी लचके
झटपट चलूँ तो छलकाए गगरी
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर,
तुमरे दरश बिन मैं तो हो गई बावरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
कैसे आऊँ मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
कैसे आऊं मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
ओरिजिनल लिरिक्स
बड़ी दूर नगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी-नगरी
कैसे आऊं मैं तेरी गोकुल नगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी,
रात को आऊं कान्हा डर माही लागे,
दिन को आऊं तो देखे सारी नगरी,
दूर नगरी,
सखी संग आऊं कान्हा शर्म मोहे लागे,
अकेली आऊं तो भूल जाऊं तेरी डगरी,
दूर नगरी,
धीरे-धीरे चलूं तो कमर मोरी लचके,
झटपट चलूं तो छलका गगरी,
दूर नगरी,
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर,
तुमरे दरस बिन मैं तो हो गई बावरी,
दूर नगरी,
कैसे आऊँ मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
कैसे आऊं मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
रात को आऊँ, कान्हा डर मोहे लागे,
दिन को आऊँ तो, देखें सारी नगरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
सखी संग आऊँ कान्हा, शर्म मोहे लागे,
अकेली आऊँ तो भूल, जाऊ डगरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
धीरे धीरे चलूँ तो, क़मर मोरी लचके
झटपट चलूँ तो छलकाए गगरी
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर,
तुमरे दरश बिन मैं तो हो गई बावरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
कैसे आऊँ मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
कैसे आऊं मैं कन्हाई, तेरी गोकुल नगरी
दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी,
ओरिजिनल लिरिक्स
बड़ी दूर नगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी-नगरी
कैसे आऊं मैं तेरी गोकुल नगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी,
रात को आऊं कान्हा डर माही लागे,
दिन को आऊं तो देखे सारी नगरी,
दूर नगरी,
सखी संग आऊं कान्हा शर्म मोहे लागे,
अकेली आऊं तो भूल जाऊं तेरी डगरी,
दूर नगरी,
धीरे-धीरे चलूं तो कमर मोरी लचके,
झटपट चलूं तो छलका गगरी,
दूर नगरी,
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर,
तुमरे दरस बिन मैं तो हो गई बावरी,
दूर नगरी,
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी | Dur Nagari Badi Dur Nagari | Krishna Bhajan | Mridul Krishna Shastri
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दूर नगरी की पुकार सुनकर दिल बेचैन हो जाता है। जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रिय से मिलने को तरस रहा हो, लेकिन रास्ते में हर कदम पर डर और शरम सताती हो। रात में चलें तो अंधेरे का डर, दिन में चलें तो सबकी नजरें चुभती हैं। सखियों के साथ जाएँ तो लाज आती है, अकेले निकलें तो रास्ता ही भूल जाएँ। धीरे-धीरे चलें तो कमर लचकने लगती है, तेज चलें तो गगरी छलक जाती है। हर तरफ से बाधाएँ, हर तरफ से बहाने, लेकिन मन तो बस एक ही जगह टिका रहता है—गोकुल की गलियों में, जहाँ कन्हाई का बसंती रंग बिखरा हुआ है। मीरा का यह विरह इतना गहरा है कि बिना दर्शन के पागलपन छा जाता है।
यह सब सुनकर लगता है कि भक्ति का रास्ता आसान नहीं होता। प्रेम में मिलन की चाह तो बहुत है, लेकिन बीच में दुनिया की नजरें, अपने मन की कमजोरियाँ, डर और शंका सब खड़े हो जाते हैं। फिर भी सच्चा प्रेमी रुकता नहीं। वो जानता है कि जितनी दूर नगरी लगे, उतना ही ज्यादा दिल की पुकार तेज होती है। बस एक बार दरबार में पहुँच जाएँ, तो सारी थकान, सारी शरम, सारा डर गायब हो जाता है। कन्हाई की एक मुस्कान से सब ठीक हो जाता है। आप सभी पर ईश्वर की कृपा बनी रहे।
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