कितना खोया कितना पाया तोल सके तो तोल भजन
कितना खोया कितना पाया तोल सके तो तोल भजन
कितना खोया कितना पाया,
तोल सके तो तोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
बिरहन क्यों उलझी झंझट में,
तेरा पिया है तेरे घट में,
तेरा पिया है तेरे घट में,
कह गए दास कबीर देख ले,
घूँघट के पट खोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
पीकर प्रेम सुधा रस प्याली,
बोल उठी मीरा मतवाली,
बोल उठी मीरा मतवाली,
राम रतन धन पायो सद्गुरु,
वस्तु दीनी अमोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
बिन भगवंत भजन पछितायो,
रे मन मूरख जन्म गँवायो,
रे मन मूरख जन्म गँवायो,
गूँज रहे जन जन के मन में,
सूरदास के बोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
अब तो चेत अरे अभिमानी,
गूँज रही तुलसी की वाणी,
गूँज रही तुलसी की वाणी,
भाय कुंभाय अनघ आलसुं,
नाम प्रभु का बोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
श्री चैतन्य कृष्ण मतवाले,
डोल डोल कर द्वारे द्वारे,
डोल डोल कर द्वारे द्वारे,
हरि बोल का अलख जगाए,
बजा मंजीरे ढोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
क्षणभंगुर संसार विनाशी,
सार कह्यो सद्गुरु अविनाशी,
सार कह्यो सद्गुरु अविनाशी,
जैन राजेश सुमिर हरि को,
जी चाहे जहाँ डोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
कितना खोया कितना पाया,
तोल सके तो तोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
तोल सके तो तोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
बिरहन क्यों उलझी झंझट में,
तेरा पिया है तेरे घट में,
तेरा पिया है तेरे घट में,
कह गए दास कबीर देख ले,
घूँघट के पट खोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
पीकर प्रेम सुधा रस प्याली,
बोल उठी मीरा मतवाली,
बोल उठी मीरा मतवाली,
राम रतन धन पायो सद्गुरु,
वस्तु दीनी अमोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
बिन भगवंत भजन पछितायो,
रे मन मूरख जन्म गँवायो,
रे मन मूरख जन्म गँवायो,
गूँज रहे जन जन के मन में,
सूरदास के बोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
अब तो चेत अरे अभिमानी,
गूँज रही तुलसी की वाणी,
गूँज रही तुलसी की वाणी,
भाय कुंभाय अनघ आलसुं,
नाम प्रभु का बोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
श्री चैतन्य कृष्ण मतवाले,
डोल डोल कर द्वारे द्वारे,
डोल डोल कर द्वारे द्वारे,
हरि बोल का अलख जगाए,
बजा मंजीरे ढोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
क्षणभंगुर संसार विनाशी,
सार कह्यो सद्गुरु अविनाशी,
सार कह्यो सद्गुरु अविनाशी,
जैन राजेश सुमिर हरि को,
जी चाहे जहाँ डोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
कितना खोया कितना पाया,
तोल सके तो तोल रे,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल,
तूने हीरा गँवाया पगले,
माटी के मोल।
तूने हीरा गंवाया पगले ।। Tune Hira Ganwaya Pagle ।।Shri Ankush Ji Maharaj #laddugopal #hira
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मूल्यवान हीरा माटी के बदले गंवा देते पगले संसार की उलझनों में फंसकर। भीतर घट में ही पिया विराजमान बिरहा झंझट व्यर्थ घूंघट पट खोल देख लें। प्रेम सुधा पी मतवाली मीरा बोल उठी सद्गुरु राम रतन धन अमोल वस्तु दान। भगवंत भजन न किया मूरख मन जन्म गंवाया सूरदास बोल जन जन मन गूंजते। अभिमानी चैतन्य तुलसी वाणी हरि नाम बोल कुंभाय अलख जगाये द्वार द्वार डोल मंजीरा ढोल। क्षणभंगुर विनाशी संसार सद्गुरु अविनाशी सार सुमिर हरि जैन राजेश जी चाहे डोल।
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Author - Saroj Jangir
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