देख बुढ़ापा अम्मा क्यों रोई चेतावनी भजन

देख बुढ़ापा अम्मा क्यों रोई राम के भजन में ना आई

 
देख बुढ़ापा अम्मा क्यों रोई चेतावनी भजन Dekh Budhapa Amma Kyo Roi Bhajan

देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई,
देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई,
हो, राम के भजन में ना आयी,
देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई। 

दिन निकला, जब हुआ सवेरा,
दिन निकला, जब हुआ सवेरा,
अरे, चाय की गिलासी से चिपक रही,
राम के भजन में ना आई,
देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई। 

आठ बजे घर घर में डोले,
हो, आठ बजे घर घर में डोले,
अरे, चुगली चाटी कर आई,
राम के भजन में ना आई,
देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई। 

चार बजे खेतों में निकली,
हो, चार बजे खेतों में निकली,
बाँध पोटली ले आई,
राम के भजन में ना आई,
देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई। 

एक दिन पीहर को चल दी,
हो, पीहर को चल दी,
भर के अटेची घर आई,
राम के भजन में ना आई,
देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई। 

धर्मराज जब लेने आये,
हो, धर्मराज जब लेने आये,
सब कुछ यहीं छोड़ भागी,
राम के भजन में ना आई,
देख बुढ़ापा, अम्मा क्यों रोई,
राम के भजन में ना आई। 


निर्गुण भजन | देख बुढ़ापा अम्मा क्यूँ रोई, राम के भजन में ना आयी | Dekh Budhapa Amma Kyu Royi Dekh Budhapa Amma Kyo Roi Bhajan

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■ Title ▹ Dekh Budhapa Amma Kyon Royi Ram Ke Bhajan Me Na Aayi
■ Artist ▹ Priya Rohilla
■ Singer ▹ Kiran Negi
■ Music ▹Kuldeep Mali Aala
■ Keyboard Player ▹Sachin Kamal
■ Lyrics & Composition ▹Traditional
■ Song Production Support ▹Rajesh Madina
■ Editing ▹KV Sain
■ Cameraman ▹Gulshan Bawa
 
बुढ़ापे के आँसू तब निकलते हैं जब राम के भजन की सुध भी नहीं रहती। खेत, चाय की गिलासी, घर‑घर की चुगली – रोज़मर्रा के झंझट इतना घेर लेते हैं कि भजन‑सभा का पल दूर हो जाता है। आठ बजे घरों में लोग डोले चला लेते हैं, लेकिन एक ही आदमी बाहर रह जाता है, जो अपने काम, अपनी ज़िम्मेदारी में इतना अटक जाता है कि भजन तक में जगह नहीं बन पाती।

बच्चों के पीहर जाने का दिन भी आता है, घर पर अटेची भर लाती है और जीवन फिर उसी रूटीन में लौट आता है। खेतों में पोटली बाँधकर निकलना, चाय की गिलासी से चिपकना, चुगली सुनना – यही सब उस भक्ति को धीरे‑धीरे डूबोता चला जाता है। जब ही लगता है कि समय और उम्र चाहती हैं कि हर पल राम के भजन में ही बीते, मगर आदतें उसे दूर खींचती रहती हैं।

फिर एक दिन धर्मराज भी आ जाते हैं, तो सब कुछ यहीं छोड़कर जाना पड़ता है, तब भी लगता है कि अब तक “राम के भजन में ना आई” – यही सबसे बड़ा भटकाव है। यह गीत याद दिलाता है कि जब शरीर भारी होने लगता है, तब भी राम के भजन को अपने भीतर बसा लेना ही सबसे बड़ा आधार है, ताकि बुढ़ापा अकेला नहीं, बल्कि एक निर्मल साथी बन जाए।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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