निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो नाथ जी भजन

निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो नाथ जी भजन

 
निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो लिरिक्स Nindara Bech Dyu Koi Le To Nath Ji Bhajan

रामो राम रटै तो , तेरा माया जाल कटैगो,
निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो ।

भाव राख सत्संग मैं जावो, चित्त मैं राखो चेतो,
हाथ जोड़ चरणा मैं लिपटु, जै कोई संत मिलै तो,
निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो ।

पाई की मण पाँच बेच दयूँ , जै कोई ग्राहक हो तो,
पंचा मे से चार छोड़ दूँ, राम रोकड़ा दे तो,
निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो।

कै तो जावो राज दुवारे , के रसिया रस-भोगी,
म्हारो पीछो छोड़ बावली, म्हे हाँ रमता-जोगी,
निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो।

कहे भरथरी सुण ऐ निन्द्रा, यहाँ ना तेरा वासा,
म्हे तो म्हारा रमता योगी, राम मिलण की आशा,
निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो।
 

Neendra bech du koi leto (निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो)

Raamo Raam Ratai To , Tera Maaya Jaal Kataigo .
Nindra Bech Dayoon Koee Le To .

यह भजन राजा भरथरी (या भरथरी) की परंपरा का प्रसिद्ध नाथजी  भजन है, जो निंद्रा (नींद) को संबोधित करके कहता है कि "नींद को बेच दूं, कोई ले ले तो!", आलस्य या सांसारिकता में लगा मन जिसे साधक बेच देना चाहता है। यह भजन राम नाम की महिमा, माया से मुक्ति, सत्संग की महत्ता और संसारिक सुखों (जैसे नींद, शरीर, राजसी भोग) को त्यागकर राम भक्ति में लीन होने का संदेश देता है। राजा भरथरी (प्राचीन राजा जो योगी बने) की तरह योगी बनकर राम मिलन की आशा में रहना सिखाता है।
सरल हिंदी में पूरा अर्थ (लाइन बाय लाइन आसान भाषा में):

रामो राम रटै तो , तेरा माया जाल कटैगो, निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो ।अर्थ: अगर राम-राम का जाप (रटना) करोगे तो तेरी माया का जाल कट जाएगा। मैं नींद को बेच दूंगा, कोई ले ले तो!
(नींद को "बेचने" का मतलब है – नींद को त्याग दो, क्योंकि राम नाम जपने से नींद कम लगती है और माया का बंधन टूटता है।)
भाव राख सत्संग मैं जावो, चित्त मैं राखो चेतो, हाथ जोड़ चरणा मैं लिपटु, जै कोई संत मिलै तो, निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो ।अर्थ: भक्ति/भाव रखकर सत्संग में जाओ, मन में सतर्कता (चेतना) रखो। हाथ जोड़कर संतों के चरणों में लिपट जाओ, अगर कोई सच्चा संत मिले तो। नींद को बेच दूं, कोई ले ले!
(सत्संग और संतों की संगति से राम भक्ति बढ़ती है, नींद/आलस्य दूर होता है।)
पाई की मण पाँच बेच दयूँ , जै कोई ग्राहक हो तो, पंचा मे से चार छोड़ दूँ, राम रोकड़ा दे तो, निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो।अर्थ: पाँच पैसे की मण (मुट्ठी भर) बेच दूं, अगर कोई ग्राहक हो। पाँचों में से चार छोड़ दूं, अगर राम "रोकड़ा" (पैसे/मोल) दे तो। नींद बेच दूं, कोई ले ले!
(यहाँ "पाँच" से पाँच इंद्रियाँ या पंच तत्व का इशारा है। चार छोड़कर एक (मन या आत्मा) राम को समर्पित कर दो। संसारिक चीजें सस्ती हैं, राम मिलन के लिए सब त्याग दो।)
कै तो जावो राज दुवारे , के रसिया रस-भोगी, म्हारो पीछो छोड़ बावली, म्हे हाँ रमता-जोगी, निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो।अर्थ: कहाँ जाओगे राजद्वार पर, कहाँ रसिक/भोगी बनोगे? हे पागल (माया में फंसी आत्मा), मेरा पीछा छोड़ दे। मैं तो रमता जोगी हूँ (राम में रमने वाला योगी)। नींद बेच दूं, कोई ले ले!
(राजसी सुख-भोग छोड़ो, मैं योगी बन गया हूँ जो राम में रमता फिरता है।)
कहे भरथरी सुण ऐ निन्द्रा, यहाँ ना तेरा वासा, म्हे तो म्हारा रमता योगी, राम मिलण की आशा, निन्द्रा बेच दयूँ कोई ले तो।अर्थ: भरथरी कहते हैं – सुनो हे नींद, यहाँ तेरा वास नहीं। मैं तो अपना रमता योगी हूँ, राम मिलने की आशा में। नींद बेच दूं, कोई ले ले!
(अंत में भरथरी खुद कहते हैं – नींद अब मेरे पास नहीं टिक सकती, क्योंकि राम भक्ति में लगा हूँ।)

कुल भावार्थ (संक्षेप में):
यह भजन योगी/भक्त की अवस्था बताता है – राम नाम जपने से माया का जाल कटता है, नींद/आलस्य/संसारिक भोग त्यागने पड़ते हैं। संतों की संगति, सत्संग, इंद्रियों का संयम और राम मिलन की तीव्र आशा से ही सच्ची मुक्ति मिलती है। नींद को "बेचने" का रूपक बहुत गहरा है – मतलब नींद जैसी सुख-सुविधा को भी त्याग दो अगर राम मिल जाए। राजा भरथरी (जो राजपाट छोड़ योगी बने) की तरह जीवन जियो। 
 
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