गोवर्धन गिरि ब्रजरज यमुना कण कण बोले राधा

गोवर्धन गिरि ब्रजरज यमुना कण कण बोले राधा


ब्रज भूमि में पाँव धरत ही,
तन-मन बोले — राधा राधा, राधा राधा।।

गोवर्धन गिरि, ब्रजरज, यमुना —
कण-कण बोले — राधा राधा।।

पशु, पक्षी, तरु, फूल-लताएं —
कुंज-कुंज बोले — राधा राधा।।

छाछ, दूध, दही, माखन-मटकी —
बंसी बोले — राधा राधा।।

निगम, आगम, सुर, सन्त-मुनि —
जन-गण बोले — राधा राधा।।

मधुर-मधुर रस चाख 'मधुप हरि' —
रसना बोले — राधा राधा।।


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ब्रज भूमि में कदम रखते ही तन-मन राधा के नाम में डूब जाता है, हर पल राधा-राधा की धुन गूँजती है। गोवर्धन पर्वत, ब्रज की रज, यमुना का तट—यहाँ का कण-कण राधा का नाम जपता है।

पशु, पक्षी, वृक्ष, फूल और लताएँ—हर कुंज में राधा का नाम ही बसता है। छाछ, दूध, दही, माखन की मटकी और बंसी की तान—सब राधा के प्रेम में रँगे हैं, हर ध्वनि में राधा-राधा की गूँज है। वेद, शास्त्र, देव, संत और मुनि—सभी राधा के नाम का गुणगान करते हैं। सारा जन-समूह राधा के रंग में डूबा है। ‘मधुप हरि’ की भक्ति का मधुर रस चखकर रसना भी बस राधा-राधा जपती है।

Song : radha radha radha radha
singer : Mamta
Lyrics: suprasidh bhajan lekhak evam sankirtan acharya, guruji Sh. Kewal Krishan Madhupji (Madhup Hari Maharaj), Amritsar

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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