सतगुरु नाल प्रीति नूं लगा लै बंदेया

सतगुरु नाल प्रीति नूं लगा लै बंदेया


सतगुरु नाल प्रीति नूं लगा लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

कच्चा भांडा इक दिन फूट जाएगा,
अंत वेले मान तेरा टूट जाएगा।
ओदी सच्ची जोत नूं जगा लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

सतगुरु नाल प्रीति नूं लगा लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

पंज चोर जेड़े तेरे अंदर वस्दे,
पापां वाला राह तैनूं नित दस्दे।
ऐनां कोलों जिंद नूं छुड़ा लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

सतगुरु नाल प्रीति नूं लगा लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

झूठी मोह माया नाल प्यार पा लया,
सच्चा नाम सतगुरु दा भुला लया।
ओदे सच्चे नाम नूं तूं ध्या लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

सतगुरु नाल प्रीति नूं लगा लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

चंगे कम कर, सतगुरु नूं तू धार लै,
स्वास स्वास विच ओदा तू नाम ध्या लै।
जीवन नूं तू सफल बना लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।

सतगुरु नाल प्रीति नूं लगा लै बंदेया,
नाम जप, मुक्ति नूं पा लै बंदेया।


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भक्त को सलाह दी जाती है कि वह सतगुरु के साथ प्रेम जोड़ ले और उनके नाम का जाप कर मुक्ति पा ले। उसका शरीर नश्वर है, जो एक दिन टूट जाएगा, इसलिए उसे गुरु की सच्ची ज्योत जलानी चाहिए। भीतर बसे पांच चोर (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) उसे पाप के रास्ते पर ले जाते हैं, पर वह गुरु के नाम से अपनी आत्मा को इनसे मुक्त कर सकता है। वह झूठी माया के प्रेम में पड़कर गुरु के सच्चे नाम को भूल गया है, उसे उस नाम का ध्यान करना चाहिए। अच्छे कर्म करके और हर सांस में गुरु का नाम जपकर वह अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। इस तरह, सतगुरु का प्रेम और नाम का जाप उसे मुक्ति का मार्ग दिखाएगा।
 
मेरी आत्मा में सतगुरु की महिमा को स्थायी बनाने के लिए सबसे पहले गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव जागृत करना आवश्यक है। जब मैं गुरु के उपदेशों को अपने जीवन में धारण करता हूँ, सत्संग में उनकी बातों को याद रखता हूँ और दैनिक जीवन में उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करता हूँ, तब गुरु की महिमा मेरे अंदर अधिक गहराई से समा जाती है। इसके अलावा, नियमित रूप से ध्यान, मनन और गुरु के शब्दों का पठन भी मेरी आत्मा को गुरु के प्रकाश से जोड़े रखता है।

सतगुरु की महिमा मेरी आत्मा में तभी स्थायी हो सकती है, जब मैं उनके दिखाए मार्ग पर लगातार चलता रहूँ और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव बनाए रखूँ। जब मैं गुरु को अपने जीवन का केंद्र मानकर उनके निर्देशों का पालन करता हूँ, तो उनकी कृपा और ज्ञान मेरे अंदर सदैव विद्यमान रहता है। इस प्रकार, गुरु की महिमा सिर्फ शब्दों तक ही नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों तक स्थायी रूप से बस जाती है। 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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