अधिप नाम का अर्थ मतलब राशि

मेरे दिल नूं करार नहीं आंदा सतगुरु भजन

मेरे दिल नूं करार नहीं आंदा
तू घर मेरे आजा दातिया।

मोड़ लया मुख मैनूं केड़ी गलों दातिया,
छेती छेती आजा, हुण कित्थे डेरे लाए नी।
ओ इस झल्ली नूं गल नहीं लांदा,
तू घर मेरे आजा दातिया।
मेरे दिल नूं करार नहीं आंदा,
तू घर मेरे आजा दातिया।

तेरा दर छड्ड के हुण केड़े दर जावां मैं,
दिल वाला हाल हुण किसनूं सुनावां मैं।
हाल दिल वाला तैनूं ही सुनाना,
तू घर मेरे आजा दातिया।
मेरे दिल नूं करार नहीं आंदा,
तू घर मेरे आजा दातिया।

तक तक राहां हुण थक गई अखियां,
होएगा दीदार कदों, आसा ऐहो रखियां।
हाथ जोड़ दी तैनूं मैं बुलावां,
तू घर मेरे आजा दातिया।
मेरे दिल नूं करार नहीं आंदा,
तू घर मेरे आजा दातिया।

आसा ते मुरादां लैके जोत मैं जगाई ए,
मैं तां हर पल तेरी करजाई वे।
सोणे फूलां वाले हार पिरोवां,
तू घर मेरे आजा दातिया।
मेरे दिल नूं करार नहीं आंदा,
तू घर मेरे आजा दातिया।


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भक्त का दिल गुरु के बिना बेचैन है, उसे चैन नहीं मिलता और वह बार-बार गुरु को अपने पास बुलाता है। वह पूछता है कि गुरु ने उससे मुंह क्यों मोड़ लिया और कहां देर लगा दी। भक्त का मन बेकरार है, वह गुरु के दर को छोड़कर और कहीं नहीं जा सकता। अपना दिल का हाल वह सिर्फ गुरु को ही सुनाना चाहता है। उसकी आंखें गुरु के दर्शन की राह तकते-तकते थक गई हैं, फिर भी वह उम्मीद रखता है। हाथ जोड़कर वह गुरु को पुकारता है। उसने गुरु के लिए आस्था और प्रेम की ज्योत जलाई है और हर पल उनकी राह देखता है। वह गुरु के लिए फूलों का हार सजाकर उनका स्वागत करना चाहता है, बस गुरु उसके पास आ जाएं।
 
गुरु के उपकार की व्यापकता को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि गुरु शिष्य को ज्ञान का मार्गदर्शक बनते हैं। गुरु के बिना वास्तविक ज्ञान, विवेक और सत्य की प्राप्ति संभव नहीं है। उनकी कृपा से ही शिष्य के मन में ज्ञान के बीज अंकुरित होते हैं और वह जीवन के हर क्षेत्र में सही निर्णय लेने में सक्षम होता है। गुरु के उपकार से ही शिष्य को आत्मज्ञान, नैतिकता और सदाचार की प्राप्ति होती है, जिससे उसका जीवन उद्देश्यपूर्ण बनता है।

गुरु के ज्ञान का विस्तार सिर्फ शिष्य तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज को उसका लाभ मिलता है। गुरु का ज्ञान शिष्य के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है और समाज में सत्य, न्याय और शांति की स्थापना करता है। इस प्रकार, गुरु के उपकार और ज्ञान का विस्तार व्यक्तिगत स्तर से लेकर सामाजिक स्तर तक होता है, जो अनंत और सार्वभौमिक है।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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