ऐसी गुरां ने पिलाई कोई होश न रही
ऐसी गुरां ने पिलाई कोई होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, कोई होश न रही
कोई होश न रही, सानूं होश न रही
सतगुरु दे दे भर भर प्याला
पी के होवे मन मतवाला
ऐसी मस्ती चढ़ाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
सतगुरु दे दे भर भर जाम
गुरमुख पींदे सुबह शाम
ऐसी लगन लगाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
सतगुरु चारों ओर अंधेरा
चानण कीता चार चफेरा
ऐसी रोशनी दिखाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
तेरी नज़र ने मन मेरा रंगिया
सब कुछ दित्ता, जो जो मंगिया
ऐसी दया बरसाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
सतगुरु मेरे दीनदयाल
सानूं कीता उसने निहाल
ऐसी राह दिखाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
कोई होश न रही, सानूं होश न रही
सतगुरु दे दे भर भर प्याला
पी के होवे मन मतवाला
ऐसी मस्ती चढ़ाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
सतगुरु दे दे भर भर जाम
गुरमुख पींदे सुबह शाम
ऐसी लगन लगाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
सतगुरु चारों ओर अंधेरा
चानण कीता चार चफेरा
ऐसी रोशनी दिखाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
तेरी नज़र ने मन मेरा रंगिया
सब कुछ दित्ता, जो जो मंगिया
ऐसी दया बरसाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
सतगुरु मेरे दीनदयाल
सानूं कीता उसने निहाल
ऐसी राह दिखाई, सानूं होश न रही
ऐसी गुरु ने पिलाई, मैनूं होश न रही
ऐसी गुरां ने पिलाई कोई होश न रही जय गुरुदेव
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भक्त का मन गुरु के प्रेम में ऐसा डूबा है कि उसे होश ही नहीं रहा। गुरु ने उसे प्रेम और ज्ञान का ऐसा प्याला पिलाया कि उसका मन मस्ती में झूम उठा। सुबह-शाम गुरु के नाम का जाम पीकर भक्त की लगन ऐसी लगी कि वह संसार को भूल गया। गुरु ने अंधेरे में रोशनी फैलाई और चारों ओर उजाला कर दिया। उनकी कृपा की नजर ने भक्त के मन को रंग दिया, जो मांगा, वह सब दिया। गुरु की दया और मार्गदर्शन ने भक्त को इतना निहाल किया कि वह पूरी तरह गुरु के रंग में रंग गया, और उसे अपनी सुध-बुध खो बैठी।
सतगुरु की महिमा अपरम्पार और अवर्णनीय है। सतगुरु का अर्थ होता है ‘सत्य का गुरु’ अर्थात वह जो सत्य के मार्ग पर चलता है और अपने शिष्यों को भी उसी मार्ग पर ले जाता है। सतगुरु की कृपा से ही जीवन में वास्तविक ज्ञान और शांति की प्राप्ति होती है। उनका उपकार अथाह है, जिसे शब्दों में बयान कर पाना असंभव है।
कबीर साहेब ने अपने दोहों में सतगुरु की महिमा को बहुत ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया है:
सतगुर की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावण हार॥
ज्ञान के आलोक से संपन्न सद्गुरु की महिमा असीमित है। उन्होंने मेरा जो उपकार किया है वह भी असीम है। उसने मेरे अपार शक्ति संपन्न ज्ञान-चक्षु का उद्घाटन कर दिया जिससे मैं परम तत्त्व का साक्षात्कार कर सका।
सतगुरु ही वह शक्ति हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर करके ज्ञान का उजाला फैलाते हैं। वे अपने शिष्यों को न केवल दुनियावी जीवन में सही राह दिखाते हैं बल्कि आध्यात्मिक मुक्ति और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। सतगुरु की शरण में जाने से जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं और आत्मा को असीम शांति की अनुभूति होती है।
सतगुरु की पहचान उनके ज्ञान से होती है। वे पवित्र शास्त्रों के अनुसार सच्चा ज्ञान देते हैं और भक्तों को सभी बुराइयों से दूर रहने की शिक्षा देते हैं। सतगुरु समाज में जाति, धर्म, पंथ और रंग के भेदभाव से परे रहकर सबके कल्याण की कामना करते हैं। वे भक्तों को सच्ची भक्ति और साधना का मार्ग दिखाते हैं, जिससे मनुष्य जीवन के असली उद्देश्य, यानी ईश्वर प्राप्ति और मोक्ष, को प्राप्त कर सकता है। सतगुरु का महत्व इतना है कि उनके बिना कोई भी आध्यात्मिक ज्ञान को नहीं समझ सकता। कबीर साहेब ने कहा है:
गुरु बिन कहु ना पाया ज्ञाना, ज्यों तोथा भुस चढ़े मूढ़ किसाना,
गुरु बिन वेद पढ़े जो प्राणि, समझे ना सार रहे अज्ञानी।
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Author - Saroj Jangir
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