नाम दा गहना पाया गुरां ने सचखण्ड दे विच बैठके
नाम दा गहना पाया गुरां ने सचखण्ड दे विच बैठके
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह टूटे, ना यह भागे,
ऐसा मजबूत धागा पिरोया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह पीला है, ना यह लाल,
अपने ही रंग में रंग लिया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह चाँदी है, ना यह सोना,
हीरों से जड़ा यह हार सजाया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना कोई चोर इसे चुरा सकता है, ना कोई इसे ज़बर्दस्ती ले सकता है,
ऐसा मज़बूत ताला लगाया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह बेटियों के लिए, ना यह बेटों के लिए,
ऐसा मोह (लगाव) छुड़ाया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह टूटे, ना यह भागे,
ऐसा मजबूत धागा पिरोया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह पीला है, ना यह लाल,
अपने ही रंग में रंग लिया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह चाँदी है, ना यह सोना,
हीरों से जड़ा यह हार सजाया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना कोई चोर इसे चुरा सकता है, ना कोई इसे ज़बर्दस्ती ले सकता है,
ऐसा मज़बूत ताला लगाया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
ना यह बेटियों के लिए, ना यह बेटों के लिए,
ऐसा मोह (लगाव) छुड़ाया गुरुओं ने, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
गुरुओं ने पाया नाम का गहना, सचखंड में बैठकर।
नाम दा गहना पाया गुरां ने बहुत ही सुन्दर गुरु भजन जरूर सुने
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सतगुरु ने सचखंड में बैठकर नाम का अनमोल गहना पहनाया, जो न टूटता है, न बिखरता है। उन्होंने ऐसा मजबूत टांका लगाया कि यह गहना कभी अलग नहीं होता। यह गहना न पीला है, न लाल, बल्कि गुरु ने इसे अपने अनोखे रंग में रंग दिया। यह न चाँदी का है, न सोने का, पर गुरु ने इसे हीरों से जड़कर अनमोल बनाया। कोई चोर इसे चुरा नहीं सकता, न कोई साधारण व्यक्ति इसे ले सकता, क्योंकि गुरु ने ऐसा ताला लगाया जो अटूट है।
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सतगुरु ने सचखंड में बैठकर नाम का अनमोल गहना पहनाया, जो न टूटता है, न बिखरता है। उन्होंने ऐसा मजबूत टांका लगाया कि यह गहना कभी अलग नहीं होता। यह गहना न पीला है, न लाल, बल्कि गुरु ने इसे अपने अनोखे रंग में रंग दिया। यह न चाँदी का है, न सोने का, पर गुरु ने इसे हीरों से जड़कर अनमोल बनाया। कोई चोर इसे चुरा नहीं सकता, न कोई साधारण व्यक्ति इसे ले सकता, क्योंकि गुरु ने ऐसा ताला लगाया जो अटूट है।
यह गहना न तियों के लिए है, न पुत्रों के लिए, क्योंकि गुरु ने मोह-माया से मुक्ति दिलाई। यह भजन सतगुरु की कृपा से मिलने वाले नाम के अनमोल रत्न, उसकी अटूटता, और मोह-माया से मुक्ति देकर सचखंड तक ले जाने की भावना को व्यक्त करता है। कबीर जी ने गुरु की महिमा को अनंत इसलिए कहा है, क्योंकि उनकी दृष्टि में सतगुरु उस अनंत प्रभु का रूप है, जो शिष्य के जीवन में अज्ञान के अंधकार को दूर करके ज्ञान का अनंत दीपक जलाता है। कबीर जी कहते हैं—“सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार॥”—यानी गुरु ने अनंत उपकार किए हैं, अनंत आँखें खोली हैं और अनंत (परमात्मा) का दर्शन कराया है
कबीर जी के अनुसार, गुरु केवल सांसारिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि शिष्य को आत्मा के वास्तविक स्वरूप से भी परिचित कराते हैं। गुरु की कृपा से शिष्य को जीवन के असली उद्देश्य और परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग मिलता है, जिसका कोई अंत नहीं होता
वे यह भी कहते हैं कि गुरु के दर्शन, सत्संग और दीक्षा का फल अनंत होता है, जो अन्य सभी पुण्यों से ऊपर है । गुरु की कृपा से शिष्य भवसागर से पार हो जाता है और उसे जो आत्मिक उन्नति, शांति और मुक्ति मिलती है, वह कभी समाप्त नहीं होती। इसलिए कबीर जी ने गुरु की महिमा को “अनंत” कहा है।
कबीर जी के अनुसार, गुरु केवल सांसारिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि शिष्य को आत्मा के वास्तविक स्वरूप से भी परिचित कराते हैं। गुरु की कृपा से शिष्य को जीवन के असली उद्देश्य और परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग मिलता है, जिसका कोई अंत नहीं होता
वे यह भी कहते हैं कि गुरु के दर्शन, सत्संग और दीक्षा का फल अनंत होता है, जो अन्य सभी पुण्यों से ऊपर है । गुरु की कृपा से शिष्य भवसागर से पार हो जाता है और उसे जो आत्मिक उन्नति, शांति और मुक्ति मिलती है, वह कभी समाप्त नहीं होती। इसलिए कबीर जी ने गुरु की महिमा को “अनंत” कहा है।
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Author - Saroj Jangir
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