हरि मोहे पार लगावो पार लगावो भव से

हरि मोहे पार लगावो पार लगावो भव से


हरि मोहे पार लगावो
पार लगावो भव से हरि मोहे
हरि मोहे पार लगावो
पार लगावो भव से.....

चंचल चित मोरा उड़त फिरत है
बाँधन चाहूँ नाहि बँधत है
हो साँई हो साँई,
मोरा जियरा छुड़ावो भव से
पार लगावो....

भाँति भाँति की रस्सी बनाकर
बाँधा इन्द्रियों ने भरमाकर
हो साँई हो साँई
मेरा बंधन काँटो भव से
पार लगावो...

तुम सच्चे गुरु समरथ स्वामी
मैँ मूरख कामी अज्ञानी
हो साँई....हो साँई....
मोहे डूबता उबारो भव से
पार लगावो....


Hari Mohe Par Lagao Bhav Se

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इस भाव में आत्मा की गहन पुकार और मोक्ष की तीव्र आकांक्षा प्रकट होती है। मन चंचल है, इंद्रियों के आकर्षण में उलझा हुआ है, और बार-बार संसार के जाल में फँस जाता है। बार-बार प्रयास करने के बावजूद, यह बंधन टूटता नहीं, और मन बार-बार भ्रम में पड़ जाता है। जीवन की राह में इंद्रियाँ तरह-तरह के मोह और बंधन की रस्सियाँ बनाकर आत्मा को बांध लेती हैं, जिससे मुक्ति कठिन हो जाती है। इस असहाय अवस्था में, केवल एक सच्चे गुरु या समर्थ स्वामी से ही पार पाने की आशा है। अपनी अज्ञानता, कमजोरी और कामनाओं को स्वीकार करते हुए, मन पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु से प्रार्थना करता है कि वह भवसागर से पार उतार दें, बंधनों को काट दें और डूबती आत्मा को उबार लें।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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