चिठिया लै जा ऊधो जा के कहियो कन्हैया से

चिठिया लै जा ऊधो जा के कहियो कन्हैया से


चिठ्ठिया लै जा ऊधो, 
जा के कहियो कन्हैया से, 
बिरहा सहा नहीं जाए।

कैसी है निगोड़ी मेरी हाथ की ये रेखा,
रूठे जो कन्हैया फिर मुड़के न देखा।
कदम के डार पे खिलता नहीं है फूल,
वृंदावन की गलियों में मिलता नहीं है धूल।
चिठ्ठिया लै जा...

कौन चुराए माखन मोरा,
तेरे बिना लगे मोहन जीवन ये कोड़ा।
कौन फोड़ेगा मेरा जल की ये मटकी,
निकसे न तन से प्राण, क्यों ये जान अटकी?
चिठ्ठिया लै जा ऊधो...

ऊधो जा के कहना हम कुछ न कहेंगे,
रूठे जो कन्हैया तो फिर रूठने न देंगे।
झूठ भी कहेगा उसे सच मान लेंगे,
अब न यशोदा से चुगली करेंगे।
चिठ्ठिया लै जा ऊधो...


चिठिया लै जा ऊधो,गोपी और ऊधो प्रसंग भजन by Singer Rupesh Choudhary

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यह भजन राधा या किसी विरहिणी गोपी की गहरी तड़प और कृष्ण-वियोग की पीड़ा को सीधे शब्दों में प्रकट करता है। ऊधो से निवेदन है कि वह एक चिट्ठी लेकर कृष्ण के पास जाए और कहे कि अब विरह सहा नहीं जाता। भाग्य की रेखाएँ भी कठोर हैं—कन्हैया रूठ गए हैं और फिर मुड़कर देखा तक नहीं। वृंदावन की गलियों में अब वह जीवन, वह आनंद नहीं रहा; कदमों के नीचे फूल नहीं खिलते, और धूल भी नहीं मिलती। कृष्ण के बिना जीवन सूना और बोझिल है—माखन चुराने वाला, मटकी फोड़ने वाला, वही मोहन अब नहीं है, तो जीवन कोड़ा जैसा लगने लगा है। प्राण शरीर में अटके हैं, क्योंकि कृष्ण की अनुपस्थिति में सब कुछ व्यर्थ है।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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