कन्हैया मेरी इन अखियों में रहता है

कन्हैया मेरी इन अखियों में रहता है


जिसके ख़ातिर अखियों से,
रोज़-रोज़ आँसू बहता है,
वही कन्हैया मेरा साजन,
इन ही अखियों में रहता है।
जिसके ख़ातिर अखियों से...

न जाने क्यों ये अखियाँ मेरी,
हरपल श्याम को ढूंढती,
छुपाकर अपने दिल में उसको,
हरदम पता वो पूछती।
ऐसी दीवानी बन बैठी,
हर पल उसको कहता है,
वही कन्हैया मेरा साजन,
इन ही अखियों में रहता है।

श्याम को सबसे छुपा-छुपा कर,
यह दुनिया से डरती है,
कहीं कोई ना चुरा ले उसको,
ये सोच-सोच सिहरती है।
प्रेम में पगलाई अखियाँ,
हरदम उससे कहती है —
वही कन्हैया मेरा साजन,
इन ही अखियों में रहता है।

छुपा के रखती है उसको,
पर देख नहीं वो पाती है,
जिसे बसाया दिल में गहरा,
उसी की प्यासी रहती है।
ना वो भीतर झाँक सके,
ना श्याम प्रकटता है,
वही कन्हैया मेरा साजन,
इन ही अखियों में रहता है।

ये अखियाँ बन आँसू झरना,
हर रोज़ धार बहाती हैं,
कि श्याम बहते संग चले आएं,
यह चाल चलाती हैं।
किसी को कुछ ना समझ में आए,
इतना चुपके कहता है —
वही कन्हैया मेरा साजन,
इन ही अखियों में रहता है।


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