होरी सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ भजन

होरी सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ भजन


होरी सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ,
जीव ईश रो भेद मिटाकर,
पूर्ण ब्रह्म कीयो री ऐ,
होरी सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ।

निज स्वरूप भूलकर भटक्यो,
अजीयाँ संग रच्यो री ऐ,
भेद भाव छुटासी सतगुरु,
सिंह और सिंग मिल्यो री ऐ होरी,
सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ।

मैं हूँ गुणगोचर खात्री,
अविद्या भ्रम मिट्यो री ऐ,
रोम-प्रकाश भयो दस-दस में,
प्रबुद्ध दोष भग्यो री ऐ होरी,
सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ।

सत-चित-आनंद शुद्ध स्वरूप,
गुणों अतीत रह्यो री ऐ,
मेरी सत्ता सब माँही व्यापक,
अंदर-बहार मिल्यो री ऐ होरी,
सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ।

श्योम प्रकाशी सबका दृष्टा,
केवल निज थ्यो री ऐ,
श्योम मालिक आप, न दूजा,
ना कोई आयो ग्यो री ऐ होरी,
सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ।

होरी सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ,
जीव ईश रो भेद मिटाकर,
पूर्ण ब्रह्म कीयो री ऐ,
होरी सतगुरु ज्ञान दियो री ऐ।



होरी सतगुरु ज्ञान दियोरी ऐ‌। Hori satguru Gyan diyori a। होरी भजन। Hori Bhajan। Sahiram Bhat !!

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अज्ञान के अंधेरे में भटके हुए मन को जब सतगुरु का साक्षात् ज्ञान मिलता है तो जीव और ईश्वर का अलगाव गलने लगता है, भीतर एक अद्भुत एकता का अनुभव जन्म लेता है। अपने असली स्वरूप को भूलकर जो देह, इन्द्रियों और संसारिक आकर्षणों में उलझा था, वह धीरे‑धीरे इन सब बंधनों से ऊपर उठकर समझने लगता है कि सच्चा ‘मैं’ न शरीर है, न मन है, बल्कि सर्वव्यापक, शांत, ज्योतिर्मय सत्ता है। गुण, दोष, पाप, पुण्य, ऊँच‑नीच के भेद जब सतगुरु की कृपा से ढीले पड़ते हैं तो भीतर और बाहर एक जैसा प्रकाश दीखने लगता है, जैसे हर रोम में चेतना की लौ जल उठी हो। इस स्थिति में संसार रहकर भी साधक का हृदय संतुलित, निर्मल और आनंद से भरा रहता है क्योंकि उसे प्रत्यक्ष बोध हो जाता है कि सबमें वही एक ब्रह्म व्याप्त है, जो न जन्म लेता है, न मरता है।

सतगुरु वह करुणामयी सत्ता हैं जो जीव को उसके ही भीतर छिपे परम सत्य से मिलवाती हैं, मानो भीड़ में बिछुड़े हुए को उसके अपने घर का रास्ता दिखा दें। वे शुद्ध, सत‑चित‑आनंद स्वरूप का परिचय देकर बता देते हैं कि सच्चा स्वामी कोई बाहर नहीं, भीतर विराजमान है, जो सबका दर्शक है पर किसी बंधन में बंधा नहीं। उनकी कृपा से जीव समझ पाता है कि न उसके अलावा दूसरा कोई मालिक है, न उससे अलग कोई और सत्ता है; सब खेल उसी एक के प्रकाश में हो रहा है। इस अनुभूति से भय, अकेलापन और हीनता मिटकर स्थिर शांति और अखंड आनंद हृदय में उतर आता है, और जीवन होली के समान उल्लासमय, प्रकाश से भरा हुआ दिखाई देने लगता है।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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