कान्हा खोलो मंदिर के द्वार भजन

कान्हा खोलो मंदिर के द्वार कृष्णा भजन

 
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार कृष्णा भजन

कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई,
मैं गीता सुनने आई,
मैं दर्शन करने आई,
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई।

ससुरा को साथ में लाई,
सासुल को साथ में लाई,
इनका करना बेड़ा पार,
मैं गीता सुनने आई,
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई।

जेठा को साथ में लाई,
जिठानी को साथ में लाई,
इनको देना आशीर्वाद,
मैं गीता सुनने आई,
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई।

देवर को साथ में लाई,
देवरानी साथ में लाई,
इनकी गोदी में दो नंदलाल,
मैं गीता सुनने आई,
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई।

नंदुल को साथ में लाई,
सखियां भी सारी आई,
इनको घर वर दो घनश्याम,
मैं गीता सुनने आई,
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई।

मैं आई सखियों को लाइ,
कान्हा दर्शन दो एक बार,
मैं गीता सुनने आई,
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई।

कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई,
मैं गीता सुनने आई,
मैं दर्शन करने आई,
कान्हा खोलो मंदिर के द्वार,
मैं गीता सुनने आई।
 
कृष्ण भजन▹कान्हा खोलो मंदिर के किवाड़ मैं गीता पढ़ने आई | Kanha Kholo Mandir Ke Kiwad | Krishna Bhajan
 
■ Title ▹ Kanha Kholo Mandir Ke Kiwad Mai Geeta Padne Aayi
■ Artist ▹Pallavi Narang
■ Singer ▹Karishma Sharma
■ Music ▹Pardeep Panchal
■ Lyrics & Composer ▹Traditional 

श्रद्धा किसी एक व्यक्ति की नहीं, एक पूरे परिवार की भावनाओं का रूप ले लेती है। जैसे ब्रज की गोपियां अपने कान्हा को न केवल अपने लिए, बल्कि अपने घर-आंगन, सास-ससुर, देवर, जेठ और सखियों के लिए भी बुलाती थीं, वैसे ही यह पुकार प्रेम के उस लोक को छूती है, जहाँ ईश्वर केवल आराध्य नहीं, परिवार का सदस्य बन जाते हैं। जब हृदय सच्चा होता है, तो भक्ति केवल आरती या श्लोक नहीं रह जाती—वह जीवन का सहज संवाद बन जाती है।

कान्हा से ‘मंदिर के द्वार खोलने’ की यह विनती प्रतीक है उस आंतरिक द्वार की जो मनुष्य के भीतर है। जब मन खुलता है, तब ज्ञान की ‘गीता’ सुनाई देने लगती है—वही जो कृष्ण ने कभी कुरुक्षेत्र में अर्जुन को सुनाई थी, और आज हर भक्त के भीतर गूँजती है। यह गीत बताता है कि सच्ची भक्ति निजी नहीं होती; वह सबको साथ लेकर चलती है। 
 
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