सतियों में एक सती अनसूया धन पति उपदेश भजन

सतियों में एक सती अनसूया धन पति उपदेश भजन


सतियों में एक सती अनसूया,
धन पति उपदेश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

एक समय मुनि नारद चाल्या,
शिव शंकर के द्वार पे,
सती अनसूया का नाम रटा वो,
धुन वीणा की तान पे,
सती अनसूया का नाम सुना जद,
बोलण लागी पार्वती,
नारद मेरे से बढ़कर,
है दुनिया में कौन सती,
आप तो माता पहुंच सको नहीं,
उस नारी के देश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

वहां से तो मुनि नारद चाल्या,
विष्णु के निज धाम को,
सती अनसूया की क्या कहूं माता,
क्या कहूं उस नाम को,
ब्रह्माणी को सुना दिया,
जा उस नारी संदेश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

विष्णु से लक्ष्मी जी पूछें,
शिव शंकर से पार्वती,
ब्रह्मा से ब्रह्माणी पूछे,
है दुनिया में कौन सती,
सांची-सांची कह दो स्वामी,
छोड़ देवो न क्लेश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

एक तरफ से विष्णु जी चाल्या,
दूजी तरफ से शिव शंकर,
तीजी तरफ से ब्रह्मा जी चाल्या,
ब्रह्माणी से घबरा कर,
एक जगह टकराए तीनों,
को भायां कित जाय रिया,
सबसे पहले शंकर आप,
कहो विष्णु कहां जाय रहे,
हम जाते हैं उस नारी के,
सत डिगाने नेम को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

सबसे पहले शंकर बोले,
सुणलो भायां बात खरी,
जगत पिता कहलावां जग में,
हम तीनों की नीत फिरी,
आपस में समझौता करलो,
कैसे सत डिगायेंगे,
वस्त्रहीन हो भोजन दे दे,
ऐसे वचन फरमायेंगे,
वस्त्रहीन होय भोजन दे दे,
द्वार खड़ा दरवेश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

इतना वचन सुना है सती ने,
थर-थर ही कंपाय रही,
अब मेरी लाज राखो सांवरिया,
इज्जत दासी की जाय रही,
और जोर तो चला नहीं,
वा पति चरणां में जाय पड़ी,
पति केवे रवि साक्षी करले,
ऐसा ही उपदेश मिला,
जल का लोटा छिड़क ले,
और मना लेयने गणेश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

छह-छह महीना का बालक कर दिया,
उनको दूध पिलाय दिया,
तीनों को अंचल में लेकर,
पालणियां में सुलाय दिया,
वहां से तो मुनि नारद आया,
वीणा पर आवाज करी,
सती अनसूया की क्या कहूं माता,
आकर जय-जयकार करी,
वहां से तो मुनि नारद चाल्या,
मना लियो न गणेश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

शंकर भवन में पग धरे तो,
पार्वती जी रोय रिया,
विष्णु भवन में पग धरे तो,
लक्ष्मी जी बेसुध पड़्या,
ब्रह्माणी की क्या कहूं सजनों,
रो-रो के वो गाती है,
कहां गए वेदों के दाता,
ऐसे आवाज लगाती है,
नारद को गुरु मानकर,
पहुंचो सीधे धाम को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

हाथ जोड़कर लक्ष्मी जी बोल्या,
शीश झुकाकर पार्वती,
ब्रह्माणी यूं उठकर बोली,
मैं तो मरी, मने मारे मती,
गर्व करे जो हारे जगत में,
या दुनिया की रीत गती,
मांका पति ने सागे रूप दे दे,
थू दुनिया में मोटी सती,
‘भगतदास’ चरणां को चाकर,
पद गायो पति प्रेम को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।

सतियों में एक सती अनसूया,
धन पति उपदेश को,
छह-छह महीना का बालक कर दिया,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को।



Sunita Swami || सत्ती अनुसुईया || राजस्थानी लोक कथा || Sati anusiya

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Bhajan ; sati anusiya katha
Singer : Sunita Swami Jhorda { Nagaur }
Music ; Raju Swami : 7568324470
Recording : Swami studio nagour
Video : pk panchriya & SRJ MUSIC
camera ; Umesh Rankawat
 
अनूसूया के निस्वार्थ समर्पण की वह झलक मानो मन के भीतर से हर संदेह छानकर रख दे; उसकी सादगी और सम्मान ने देवों के गरिमामय रूपों तक को एक साधारण माता की गोद में लिपटा दिया। उस एक दृढ़ कृपा में स्त्रीत्व की शुद्धि और पतिव्रता का तेज इतना उज्जवल हुआ कि ब्रह्मा-विष्णु-शिव भी उसके आगे झुकने को विवश हो उठे — यह केवल चमत्कार नहीं, पर आत्मा की उस मुक्ति की गाथा है जिसने संसार की परंपराएँ भी विचलित कर दीं। अनूसूया का साहस, उसकी लाज बचाने की तीव्र इच्छा और साथ ही बिना शब्दों की विनम्रता ने जन्म-दोहन के पार एक नयी निष्ठा जगा दी; वह छः-छह माह के बालक को भी मातृत्व की मृदु छाया से सँभालते हुए दैवीयों को मानवीय प्रेम सिखा देती है। युगों तक गूँजने वाली यही कथा बताती है कि सच्ची श्रद्धा और निष्ठा कैसी भी व्यवस्था हो, उसे नर्म कर सकती है, और जो गुण एक सती में होता है वह देवत्व को भी मान्य करवा देता है। 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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