तुम तो भोले अस्सी बरस के मेरी बाली उमरिया

तुम तो भोले अस्सी बरस के मेरी बाली उमरिया

 
तुम तो भोले अस्सी बरस के मेरी बाली उमरिया

तुम तो भोले अस्सी,
तुम तो भोले अस्सी बरस के,
मेरी बाली उमरिया,
बनवाये दे रे भोला मोहि,
सोने की अटरिया।

इतना सुनकर शिव शंकर ने,
विश्वर्कमा बुलवाये,
सोने का एक महल बनाया,
सोने के कलश धराये,
काग कंगूरे सब सोने के,
सोने की किबिड़िया,
बनवाये दे रे भोला मोहि,
सोने की अटरिया।

शिव और गौरा दोनों मिलकर,
स्वर्ण महल में आये,
रावण जैसे पंडित ज्ञानी,
पूजन करने आये,
कैसो सुंदर महल बनो है,
ठहरे ना नज़रिया,
बनवाये दे रे भोला मोहि,
सोने की अटरिया।

किया संकल्प शिव शंकर ने,
रावण कर फैलाये,
देहु दक्षिणा मुझको स्वामी,
कारज सफल बनाये,
क्या देदू मैं इस ब्राह्मण को,
लेजा ये अटरिया,
बनवाये दे रे भोला मोहि,
सोने की अटरिया।

शिव और गौरा दोनों मिलकर,
वापिस कैलाश आये,
काशीनाथ कहे जग दाता,
हमे महल ना भाये,
गौरा बोली साथ चलूंगी,
तेरी नाथ नगरीया,
ना चाहिए रे भोले मोहि,
सोने की अटरिया।

तुम तो भोले अस्सी,
तुम तो भोले अस्सी बरस के,
मेरी बाली उमरिया,
बनवाये दे रे भोला मोहि,
सोने की अटरिया।


शिवरात्रि स्पेशल भोले बाबा का भजन- तुम तो भोले अस्सी बरस के मेरी बारी उमरिया। Shivratri special

Singer : Renu Club

दृश्य काशी का है, जहाँ भोलेनाथ का सहज स्वभाव झलकता है — वे सोने की अटरिया भले बनवा लें, पर उनका हृदय उस वैभव में नहीं बसता। जिसे संसार स्वर्ण महल कहकर पूजता है, वह उनके लिए बस रावण को दी गई दक्षिणा का प्रतीक बन जाता है। यह कहानी दिखाती है कि जब ईश्वर किसी भक्त की भावना से प्रभावित होते हैं, तो असंभव भी संभव कर देते हैं; पर अंततः उनका मन साधारण में ही रमता है। शिव और गौरा का लौटकर कैलाश आना इसी सत्य को उजागर करता है — असली धन वह नहीं जो चमके, बल्कि वह जो प्रेम से मन को उजाल दे।

यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि आडंबर से भरा जीवन भले क्षणिक सुख दे, पर परम शांति सादगी और प्रेम में ही बसती है। शिव और पार्वती का संवाद उस दैवी पारस्परिकता का रूपक है जहाँ वैभव त्याग कर ब्रह्मानंद की दिशा मिलती है। स्वर्ण अटरिया उनकी दृष्टि में केवल एक माध्यम थी, साध्य नहीं। यही कारण है कि वे लौट आते हैं, बिना किसी मोह के

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