कान्हा मंदिर में आंसू बहाने लगे भजन
कान्हा मंदिर में आंसू बहाने लगे भजन
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
अब न कीर्तन में नर्तन कहीं हो रहा,
अब न भक्तों का दर्शन कहीं हो रहा,
कितना सुनसान मंदिर पड़ा देख कर,
कान्हा अश्कों में भी मुस्कुराने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
अब न याचक कोई, न दया पात्र है,
पूजा में केवल पुजारी ही मात्र है,
अपना जीवन बचाने में सब लग गए,
अपने कान्हा को अब सब भुलाने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
सेवक-पुजारी भी खड़े अब खाली,
भक्त सब खो गए, छोटे हों या बाली,
प्रसाद लगाने कोई आता नहीं,
पेट के चूहे अब कुलबुलाने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
सोचते हैं – ये कैसी लीला घड़ी?
लौट कर ये तो मुझ पर ही भारी पड़ी,
मेरे भक्तों बिना मेरा क्या मोल है?
सोच-कर खुद-ब-खुद पछताने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
अब न कीर्तन में नर्तन कहीं हो रहा,
अब न भक्तों का दर्शन कहीं हो रहा,
कितना सुनसान मंदिर पड़ा देख कर,
कान्हा अश्कों में भी मुस्कुराने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
अब न याचक कोई, न दया पात्र है,
पूजा में केवल पुजारी ही मात्र है,
अपना जीवन बचाने में सब लग गए,
अपने कान्हा को अब सब भुलाने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
सेवक-पुजारी भी खड़े अब खाली,
भक्त सब खो गए, छोटे हों या बाली,
प्रसाद लगाने कोई आता नहीं,
पेट के चूहे अब कुलबुलाने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
सोचते हैं – ये कैसी लीला घड़ी?
लौट कर ये तो मुझ पर ही भारी पड़ी,
मेरे भक्तों बिना मेरा क्या मोल है?
सोच-कर खुद-ब-खुद पछताने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
बंसी वाले को हम याद आने लगे,
कान्हा मंदिर में आँसू बहाने लगे।।
कान्हा मंदिर में आंसू बहाने लगे | Kanha Mandir Mein Aansu Bahane Lage | Shyam Bhajan 21 | Amit Kalra
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जीवन में जब हर सांस का उद्देश्य केवल ईश्वर की भक्ति और स्मरण बन जाता है, तब मन को सच्ची शांति और संतोष की अनुभूति होती है। सांसों की तरह ही, हर क्षण में प्रभु का नाम लेना, उनकी बंदगी करना और उनके दरबार में सिर झुकाना, जीवन को सार्थक बना देता है। जब भी कोई दुख या जरूरत आती है, तो प्रभु की शरण में जाकर मन हल्का हो जाता है और कृतज्ञता से दोनों हाथ जुड़ जाते हैं। उनके द्वार पर बार-बार आकर, हर ग्यारस को दर्शन कर, निशान लेकर श्रद्धा से सिर नवाना, यही सच्चे प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।
श्याम बाबा का प्रेम और कृपा अनंत है, जो अपने भक्तों को हर पल अपनी छाया में रखते हैं। उनका दरबार भक्तों के लिए सुख, शांति और आस्था का केंद्र है, जहाँ हर कोई अपने दुख भूलकर केवल भक्ति में लीन हो जाता है। श्याम बाबा की महिमा का गुणगान करना, जीवन के हर जन्म में उनका प्रेमी बने रहना, और अपनी पूरी जिंदगी को उनके नाम समर्पित करना ही सच्ची भक्ति है। ऐसे प्रभु की बंदगी में ही जीवन का परम सुख और मोक्ष छुपा है, और उनकी कृपा से ही सांसों का हर पल धन्य हो जाता है।
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श्याम बाबा का प्रेम और कृपा अनंत है, जो अपने भक्तों को हर पल अपनी छाया में रखते हैं। उनका दरबार भक्तों के लिए सुख, शांति और आस्था का केंद्र है, जहाँ हर कोई अपने दुख भूलकर केवल भक्ति में लीन हो जाता है। श्याम बाबा की महिमा का गुणगान करना, जीवन के हर जन्म में उनका प्रेमी बने रहना, और अपनी पूरी जिंदगी को उनके नाम समर्पित करना ही सच्ची भक्ति है। ऐसे प्रभु की बंदगी में ही जीवन का परम सुख और मोक्ष छुपा है, और उनकी कृपा से ही सांसों का हर पल धन्य हो जाता है।
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Author - Saroj Jangir
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