क्यों करता अभिमान रे बन्दे है झूठी है तेरी शान भजन

क्यों करता अभिमान रे बन्दे है झूठी है तेरी शान भजन

क्यों करता अभिमान रे बन्दे,
है झूठी है तेरी शान रे ।।
क्यों करता अभिमान रे बन्दे,
है झूठी है तेरी शान रे

तेरे जैसे लाखो ही भटके,
मोह माया में आके अटके,
रहा ना उनका कोई नाम  रे बन्दे
है झूठी है तेरी शान रे
क्यों करता अभिमान रे बन्दे,
है झूठी है तेरी शान रे

झूठी है माया झूठी है काया,
है तेरा जो हरिगुण गाया
जप ले हरी का नाम रे बन्दे
है झूठी है तेरी शान रे
क्यों करता अभिमान रे बन्दे,
है झूठी है तेरी शान रे

साथ ना चलते हीरे मोती,
एक सहारा हरी की जोति
बन जा तू धनवान रे बन्दे
है झूठी है तेरी शान रे
क्यों करता अभिमान रे बन्दे,
है झूठी है तेरी शान रे


Kyo Karta Abhiman Re Bande Kabir Bhajan

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बाहरी रौब—सम्पत्ति, नाम, शोहरत—क्षणभंगुर हैं; किसी भी समय छिन सकती हैं। जब पहचान ग़लत आधार पर टिकी हो, तो वह धुंध की तरह छिटक जाती है। असल ताकत और सुरक्षा वही है जो भीतर की रोशनी से आती है—वह आंतरिक हरी की ज्योति जो स्थायी सहारा बनकर रहती है। माया और देह दोनों-संयोजन दिखाकर भ्रम फैलाते हैं, पर वे असल में खोखले हैं; इन्हीं भ्रमों से निकलकर नाम जपने, आत्म-चेतना थामने और ईश्वर की याद में डूब जाने से जीवन का वास्तविक धन मिल सकता है।

हर दिखावे के पीछे एक सच है: अस्थायी चीजों के पीछे दौड़ने से असल सुख नहीं मिलता। हीरे-मोतियों का साथ छूट सकता है, पर अंदर की रोशनी कभी नहीं टूटती जब उसे खोजा और थामा जाए। इसलिए हर क्षण विनम्रता बनी रहे और अपनी चेतना को उस परम ज्योति की ओर मोड़ा जाए। यही राह दिल को स्थिर करती है, डर मिटाती है और जीवन में सच्चा वैभव भर देती है। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री हरी जी की
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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