म्हारा गिरधर लाल थारो नचायो नाचूं मैं भजन
म्हारा गिरधर लाल थारो नचायो नाचूं मैं भजन
म्हारा गिरधर लाल,
थारो नचायो नाचूं मैं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
थारे घर में रहूं निरंतर,
थारो ही हाट चलाऊं,
थारे धन से थारे जन की,
सेवा टहल बजाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
ज्या रंग रा कपड़ा पहिरावे,
वैसो ही स्वांग बनाऊं,
जैसा बोल बुलावे मुख से,
वैसी ही बात सुनाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
रूखा सूखा जो कछु देवें,
थारे ही भोग लगाऊं,
खीर परस या छाछ राबड़ी,
सबड़ प्रेम से खाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
घर का प्राणी कयो न माने,
मन में खुशी मनाऊं,
थारे इस मंगल विधान में,
मैं क्यों टांग अड़ाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
जो तू ठोकर मार गिरावे,
लकड़ी ज्यूं गिर जाऊं,
जो तू माथे ऊपर बिठावे,
तो भी न शरमाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
कोस हजार पकड़ ले जावे,
दौड़ो दौड़ो जाऊं,
जो तू आसन देकर बिठावे,
गोड़ो नाही हिलाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
जो तू तन के रोग लगावे,
ओढ़ सिरख सो जाऊं,
जो तू काल रूप बन आवे,
लपक गोद में आऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
उल्टा सुल्टा जो कुछ कर ले,
मंगल रूप लखाऊं,
थारी मन चाही में प्यारा,
अपनी चाह मिलाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
म्हारा गिरधर लाल,
थारो नचायो नाचूं मैं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
थारो नचायो नाचूं मैं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
थारे घर में रहूं निरंतर,
थारो ही हाट चलाऊं,
थारे धन से थारे जन की,
सेवा टहल बजाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
ज्या रंग रा कपड़ा पहिरावे,
वैसो ही स्वांग बनाऊं,
जैसा बोल बुलावे मुख से,
वैसी ही बात सुनाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
रूखा सूखा जो कछु देवें,
थारे ही भोग लगाऊं,
खीर परस या छाछ राबड़ी,
सबड़ प्रेम से खाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
घर का प्राणी कयो न माने,
मन में खुशी मनाऊं,
थारे इस मंगल विधान में,
मैं क्यों टांग अड़ाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
जो तू ठोकर मार गिरावे,
लकड़ी ज्यूं गिर जाऊं,
जो तू माथे ऊपर बिठावे,
तो भी न शरमाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
कोस हजार पकड़ ले जावे,
दौड़ो दौड़ो जाऊं,
जो तू आसन देकर बिठावे,
गोड़ो नाही हिलाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
जो तू तन के रोग लगावे,
ओढ़ सिरख सो जाऊं,
जो तू काल रूप बन आवे,
लपक गोद में आऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
उल्टा सुल्टा जो कुछ कर ले,
मंगल रूप लखाऊं,
थारी मन चाही में प्यारा,
अपनी चाह मिलाऊं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
म्हारा गिरधर लाल,
थारो नचायो नाचूं मैं,
म्हारा नटराजा,
थारो नचायो नाचूं रे।
Mahro Girdharlal Tharo Nachayo Nachu Re म्हारा गिरधरलाल थाँरो नचायो नाचूँ रे। By Indresh Upadhyay Ji
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Mahro Girdharlal Tharo Nachayo Nachu Re म्हारा गिरधरलाल थाँरो नचायो नाचूँ रे। By Indresh Upadhyay Ji #bhajan #vrindavan
गिरधर लाल नटराजा भक्त को नचाते तथा घर में निरंतर रहने का सौभाग्य देते हैं। उनके धन से जन सेवा बजाते तथा रंग-रूप स्वांग बनाकर बोलचाल अनुसरण करते हैं। रूखा-सूखा भोग लगाकर प्रेम से खाते तथा घर के प्राणी न मानें तो भी खुशी मनाते हैं। ठोकर मार गिरावें या माथे बिठावें, कोस दूर ले जावें या आसन देकर बिठावें, रोग लगावें या काल बन आवें, सबमें गोद में लपककर दौड़ते तथा उल्टा-सुल्टा मंगल रूप देखते हैं। उनकी मनचाही में अपनी चाह मिलाकर नाचते रहते हैं।
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Author - Saroj Jangir
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