सारी मटकी का माखन बिखेर गयो भजन
सारी मटकी का माखन बिखेर गयो भजन
सारी मटकी का माखन बिखेर गयो रे॥
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
घाटों में ढूंढ़ आई पनघट पे खोज़ आई॥
गोपियों के बीच से निकल गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
बागों में ढूंढ़ आई माली से पूछ आई॥
कलियों के बीच से निकल गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
सखियों से पूछ आई दाऊ से पूछ आई॥
गलियों के बीच से निकल गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
वृंदावन में खोज़ आई घर-घर में बोल आई॥
ब्रज की लताओं में छुप गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
घाटों में ढूंढ़ आई पनघट पे खोज़ आई॥
गोपियों के बीच से निकल गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
बागों में ढूंढ़ आई माली से पूछ आई॥
कलियों के बीच से निकल गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
सखियों से पूछ आई दाऊ से पूछ आई॥
गलियों के बीच से निकल गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
वृंदावन में खोज़ आई घर-घर में बोल आई॥
ब्रज की लताओं में छुप गयो रे।
यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे॥
सारी मटकी का माखन...
कृष्ण भजन || सारी मटकी का माखन बिखेर गयो रे || Saari matki ka makhan bikher gayo re
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Title - Saari matki ka makhan bikher gayo re
Artist - Vanshika Sharma
Singer - Aarti
कृष्ण की बाल-लीलाओं में मासूमियत, चंचलता और प्रेम की अद्भुत मिठास है। माखन चुराने की उनकी शरारतें पूरे ब्रज में प्रसिद्ध हैं। यशोदा के घर की सारी मटकी का माखन बिखर गया है, लेकिन उनका लाला कहीं नजर नहीं आता। माँ यशोदा का मन व्याकुल है, वह अपने नटखट कान्हा को खोजने के लिए घाट-घाट, पनघट, बाग-बगिचों, गलियों और वृंदावन की हर लता में ढूंढती है।
गोपियों के बीच, कलियों के झुरमुट में, सखियों और दाऊ से पूछने पर भी कान्हा का कोई पता नहीं चलता। ऐसा लगता है जैसे वह अपनी शरारतों के बाद हर जगह से मुस्कुराता हुआ निकल गया हो और अब वृंदावन की लताओं में कहीं छुप गया है।
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बन गए श्याम तेरे बावरे सांवरे
सांवरिया नाम तुम्हारो लागे मन जीते प्यारा
श्रृंगार तेरा देखा तो तुझ में खो गया हूँ
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Title - Saari matki ka makhan bikher gayo re
Artist - Vanshika Sharma
Singer - Aarti
कृष्ण की बाल-लीलाओं में मासूमियत, चंचलता और प्रेम की अद्भुत मिठास है। माखन चुराने की उनकी शरारतें पूरे ब्रज में प्रसिद्ध हैं। यशोदा के घर की सारी मटकी का माखन बिखर गया है, लेकिन उनका लाला कहीं नजर नहीं आता। माँ यशोदा का मन व्याकुल है, वह अपने नटखट कान्हा को खोजने के लिए घाट-घाट, पनघट, बाग-बगिचों, गलियों और वृंदावन की हर लता में ढूंढती है।
गोपियों के बीच, कलियों के झुरमुट में, सखियों और दाऊ से पूछने पर भी कान्हा का कोई पता नहीं चलता। ऐसा लगता है जैसे वह अपनी शरारतों के बाद हर जगह से मुस्कुराता हुआ निकल गया हो और अब वृंदावन की लताओं में कहीं छुप गया है।
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Author - Saroj Jangir
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