गुरु बिन घोर अंधेरा गुरु भजन
गुरु बिन घोर अंधेरा गुरु भजन
सद्गुरु जिनका नाम है, घट के भीतर धाम,
ऐसे दीनदयाल को, बारंबार प्रणाम।।
परमेश्वर से गुरु बड़े, तुम देखो वेद-पुराण,
शेख फरीदा यूं कहे, गुरु कर गए भगवान।।
मुखड़ा
साधो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा,
संतो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा।
जैसे मंदिर दीपक बिन सुना,
नहीं वस्तु का बेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
जब तक कन्या रहत कुँवारी,
नहीं पिया का फेरा रे।
आठों पहर रहत आनंद में,
खेले खेल घनेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
मृग नाभि में बसे कस्तूरी,
नहीं मृग को बेरा रे।
गाफ़िल हो बन-बन में डोले,
सूंघे घास घनेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
पत्थर माहीं अग्नि व्यापे,
नहीं पत्थर को बेरा रे।
चकमक चोट लगी गुरु-गम की,
फूटे आग घनेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
मांगे साहिब, मिल्या गुरु पूरा,
जागे भाग बलेरा रे।
कहत कबीर, सुनो भाई साधो,
गुरु चरणन में बसेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
मुखड़ा दोहराव अंत में
साधो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा,
संतो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा।
जैसे मंदिर दीपक बिन सुना,
नहीं वस्तु का बेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
ऐसे दीनदयाल को, बारंबार प्रणाम।।
परमेश्वर से गुरु बड़े, तुम देखो वेद-पुराण,
शेख फरीदा यूं कहे, गुरु कर गए भगवान।।
मुखड़ा
साधो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा,
संतो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा।
जैसे मंदिर दीपक बिन सुना,
नहीं वस्तु का बेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
जब तक कन्या रहत कुँवारी,
नहीं पिया का फेरा रे।
आठों पहर रहत आनंद में,
खेले खेल घनेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
मृग नाभि में बसे कस्तूरी,
नहीं मृग को बेरा रे।
गाफ़िल हो बन-बन में डोले,
सूंघे घास घनेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
पत्थर माहीं अग्नि व्यापे,
नहीं पत्थर को बेरा रे।
चकमक चोट लगी गुरु-गम की,
फूटे आग घनेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
मांगे साहिब, मिल्या गुरु पूरा,
जागे भाग बलेरा रे।
कहत कबीर, सुनो भाई साधो,
गुरु चरणन में बसेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
मुखड़ा दोहराव अंत में
साधो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा,
संतो रे, गुरु बिन घोर अंधेरा।
जैसे मंदिर दीपक बिन सुना,
नहीं वस्तु का बेरा रे।।
गुरु बिन घोर अंधेरा...
Guru Bin Ghor Andhera , Guru Mahima Bhajan DINESH BHATT
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सतगुरु का नाम हृदय में बसता है, और वे दीन-दयाल हैं, जिन्हें बार-बार प्रणाम किया जाता है। वेद-पुराणों में उनकी महिमा परमेश्वर से भी ऊँची बताई गई है, और शेख फरीद कहते हैं कि गुरु ने ही भगवान को प्राप्त करवाया। गुरु के बिना जीवन में घनघोर अंधेरा छाया रहता है, जैसे बिना दीपक के मंदिर सूना हो और वस्तुओं का कोई पता न चले।
जब तक कन्या कुंवारी रहती है, उसे पति की चिंता नहीं सताती; वह आठों पहर आनंद में खेल में मगन रहती है। ठीक वैसे ही, गुरु के मार्गदर्शन के बिना मन भटकता रहता है। मृग की नाभि में कस्तूरी बसती है, पर उसे इसका भान नहीं; वह गाफिल होकर जंगल में घास सूँघता भटकता है। गुरु के बिना सत्य की पहचान नहीं होती। पत्थर में अग्नि छिपी है, पर उसे चकमक की चोट से गुरु के ज्ञान की तरह प्रकट किया जाता है। जब पूर्ण गुरु का साथ मिलता है, तो भाग्य जाग उठता है, और साहिब का मिलन हो जाता है। कबीर कहते हैं कि साधो, गुरु के चरणों में ही ठिकाना है। यह भजन सतगुरु की महिमा, उनके बिना जीवन के अंधेरे, और उनकी कृपा से सत्य व ईश्वर की प्राप्ति की भावना को व्यक्त करता है।
जब तक कन्या कुंवारी रहती है, उसे पति की चिंता नहीं सताती; वह आठों पहर आनंद में खेल में मगन रहती है। ठीक वैसे ही, गुरु के मार्गदर्शन के बिना मन भटकता रहता है। मृग की नाभि में कस्तूरी बसती है, पर उसे इसका भान नहीं; वह गाफिल होकर जंगल में घास सूँघता भटकता है। गुरु के बिना सत्य की पहचान नहीं होती। पत्थर में अग्नि छिपी है, पर उसे चकमक की चोट से गुरु के ज्ञान की तरह प्रकट किया जाता है। जब पूर्ण गुरु का साथ मिलता है, तो भाग्य जाग उठता है, और साहिब का मिलन हो जाता है। कबीर कहते हैं कि साधो, गुरु के चरणों में ही ठिकाना है। यह भजन सतगुरु की महिमा, उनके बिना जीवन के अंधेरे, और उनकी कृपा से सत्य व ईश्वर की प्राप्ति की भावना को व्यक्त करता है।
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Author - Saroj Jangir
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