तुम्हें नहीं देखा हनुमान अंगूठी कहां से लाये भजन
तुम्हें नहीं देखा हनुमान अंगूठी कहां से लाये भजन
तुम्हें नहीं देखा हनुमान,अंगूठी कहां से लाये,
मेरी नहीं जान पहचान,
अंगूठी कहां से लाये,
तुम्हें नहीं देखा हनुमान,
अंगूठी कहां से लाये।
ना हीं तुम्हें देखा जनकपुरी में,
ना हीं मुनियों के साथ,
अंगूठी कहां से लाये,
तुम्हें नहीं देखा हनुमान,
अंगूठी कहां से लाये।
ना हीं तुम्हें देखा अवधपुरी में,
ना हीं रघुवर के साथ,
अंगूठी कहां से लाये,
तुम्हें नहीं देखा हनुमान,
अंगूठी कहां से लाये।
ना हीं तुम्हें देखा,
गंगा तट पर,
ना हीं केवट के साथ,
अंगूठी कहां से लाये,
तुम्हें नहीं देखा हनुमान,
अंगूठी कहां से लाये।
ना हीं तुम्हें देखा,
पंचवटी पर,
ना हीं लक्ष्मण के साथ,
अंगूठी कहां से लाये,
तुम्हें नहीं देखा हनुमान,
अंगूठी कहां से लाये।
ना हीं तुम्हें देखा,
चित्रकूट में,
ना हीं ऋषियों के साथ,
अंगूठी कहां से लाये,
तुम्हें नहीं देखा हनुमान,
अंगूठी कहां से लाये।
सीता भजन !! अरे अंगूठी कहां से लाये हनूमत बताये देऊ दिल की बात !! Angothi Kahan !! Manisha Shastri
Title:- अरे अंगूठी कहां से लाये हनूमत बताये देऊ दिल की बात
Singer:- Manisha Shastri
Artist :- Prem Narayan
Writer:- Manisha Shastri
जब हनुमान जी अंगूठी लेकर जताई में आते हैं, तो सीता माता का यह सवाल दिल को हिला देता है—“तुम्हें तो न तो जनकपुरी में देखा है, न अवधपुरी में, न गंगा तट पर, न पंचवटी पर… फिर यह अंगूठी कहाँ से लाए हो?” यह सवाल बस एक चिह्न की जाँच नहीं, बल्कि इस बात की खोज है कि इस दुनिया के हर कोने से जुड़े रिश्तों के बीच जो अदृश्य डोर भगवान से बंधी होती है, वही यहाँ कैसे खुलकर दिख रही हर।
इस भाव में यह भी समझ आता है कि कभी‑कभी देखे बिना भी जुड़ाव हो जाता है—जनकपुरी, अवधपुरी, गंगा तट, चित्रकूट, पंचवटी—ये सब तो बाहर के हीनाम हैं, लेकिन भक्ति और सच्ची सेवा की जड़ अंदर किसी और तरह से बढ़ी रहती है। हनुमान यह नहीं कहते कि “देखा था”, बल्कि वह अंगूठी बोलती है कि “मैं किसके हाथ से निकली हूँ, आप खुद जानते हैं।” ऐसे पल आते हैं जब अंदर की पहचान दिखाई देती है, बाहर की उपस्थिति की ज़रूरत ही नहीं रहती, और भक्त की सच्ची पहचान उसके कर्म और संकल्प से बन जाती है। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री श्रीराम और जय श्री हनुमान जी की।
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