कलियुग में आई यह कैसी घड़ी भजन
कलियुग में आई यह कैसी घड़ी भजन
कलियुग में आई यह कैसी घड़ी,
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी!
लोभी, भोगी बने हैं जोगी,
मोह-माया के सभी रोगी।
धर्म पे आई ये विपदा बड़ी...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
सच्चे संतों की न सुनवाई,
मात-पिता की सुधि बिसराई।
मर्यादा सारी रह गई धरी...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
बचपन खेलकूद में खोया,
जवानी मोह-निशा में सोया।
आया बुढ़ापा तो आँख खुली...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
शाश्वत मौका है, समय न गंवाओ,
राम-नाम धन खूब कमाओ।
दौलत सारी रह जाएगी पड़ी...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी!
लोभी, भोगी बने हैं जोगी,
मोह-माया के सभी रोगी।
धर्म पे आई ये विपदा बड़ी...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
सच्चे संतों की न सुनवाई,
मात-पिता की सुधि बिसराई।
मर्यादा सारी रह गई धरी...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
बचपन खेलकूद में खोया,
जवानी मोह-निशा में सोया।
आया बुढ़ापा तो आँख खुली...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
शाश्वत मौका है, समय न गंवाओ,
राम-नाम धन खूब कमाओ।
दौलत सारी रह जाएगी पड़ी...
सबको आज अपनी-अपनी पड़ी।।
Kalyug Me Aayi Yeh Keshi Ghadi ।। कलयुग में आई यह कैसी घड़ी ।। Latest Bhajan ।।
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Bhajan (Katha) Vachak :- Baal Sant Shashwat Ji Maharaj बालसंत श्री शाश्वत जी महाराज
कलियुग की स्थिति में मनुष्य का झुकाव बाहरी आकर्षणों और स्वार्थ की ओर बढ़ जाता है। जब हर किसी को केवल अपनी ही चिंता रह जाती है, तब धर्म, करुणा और त्याग के मूल्य हाशिए पर चले जाते हैं। लोभ और भोग की दौड़ ने साधुता तक को ढँक लिया है, और मोह-माया के बंधन मानव को रोगी बना रहे हैं। यह वही समय है जब माता-पिता का आदर भुला दिया जाता है और सच्चे संतों के वचनों को नकार कर लोग भ्रम और अव्यवस्था में जीने लगते हैं। मर्यादा, जो मानवता की असली ढाल है, केवल शब्दों तक सीमित रह जाती है और आचरण से दूर हो जाती है।
मनुष्य का जीवन तीन अवस्थाओं में बंटा हुआ है, परंतु अक्सर वह उन्हें व्यर्थ गंवा देता है। बचपन खेल में, जवानी मोह और मदिरा में, और बुढ़ापा पछतावे में बीत जाता है। जब तक जागृति आती है, तब तक जीवन का अधिकतर समय बीत चुका होता है। यही कारण है कि शाश्वत सत्य की ओर मुड़ने की प्रेरणा दी जाती है—राम नाम का भजन-स्मरण ही जीवन की सबसे अमूल्य कमाई है। धन-दौलत, वैभव और सारी भौतिक वस्तुएँ यहीं रह जाती हैं, परंतु प्रभु का नाम और साधना का पुण्य आत्मा के साथ चलता है और जन्म-जन्मांतर का मार्ग प्रकाशित करता है। यही पथ जीवन की अंधकारमयी घड़ी में वास्तविक प्रकाश है।
मनुष्य का जीवन तीन अवस्थाओं में बंटा हुआ है, परंतु अक्सर वह उन्हें व्यर्थ गंवा देता है। बचपन खेल में, जवानी मोह और मदिरा में, और बुढ़ापा पछतावे में बीत जाता है। जब तक जागृति आती है, तब तक जीवन का अधिकतर समय बीत चुका होता है। यही कारण है कि शाश्वत सत्य की ओर मुड़ने की प्रेरणा दी जाती है—राम नाम का भजन-स्मरण ही जीवन की सबसे अमूल्य कमाई है। धन-दौलत, वैभव और सारी भौतिक वस्तुएँ यहीं रह जाती हैं, परंतु प्रभु का नाम और साधना का पुण्य आत्मा के साथ चलता है और जन्म-जन्मांतर का मार्ग प्रकाशित करता है। यही पथ जीवन की अंधकारमयी घड़ी में वास्तविक प्रकाश है।
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Admin - Saroj Jangir
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