मै की की सिफ्ता दसा मनमोहन दे दरबार दिया
मै की की सिफ्ता दसा मनमोहन दे दरबार दिया
मैं की-की सिफ़ता दसां,
मनमोहन दे दरबार दियां।
तेरे दर दियां ठंडियां छांवां,
तप्दे सीने नूं ठार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
गरुड़ सवारी सोहणी लगदी,
हाथ विच मुरली सोहणी सजदी,
सिफ़ता तारणहार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
दर तेरे ते झूलदे झंडे,
सब नूं मिठियां मुरादां वंडदे,
संगतां अरज़ गुज़ार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
साफ़ जीणां दियां हुंदियां नीतां,
श्याम दे नाल हुंदियां प्रीतां,
नईं खुशियां संसार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
मनमोहन दे दरबार दियां।
तेरे दर दियां ठंडियां छांवां,
तप्दे सीने नूं ठार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
गरुड़ सवारी सोहणी लगदी,
हाथ विच मुरली सोहणी सजदी,
सिफ़ता तारणहार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
दर तेरे ते झूलदे झंडे,
सब नूं मिठियां मुरादां वंडदे,
संगतां अरज़ गुज़ार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
साफ़ जीणां दियां हुंदियां नीतां,
श्याम दे नाल हुंदियां प्रीतां,
नईं खुशियां संसार दियां,
मैं की-की सिफ़ता दसां...
मैं की की सीफतां दसां मनमोहन दे दरबार दीयाँ
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उनके दर पर जो शीतल छाया मिलती है, वह तपते हुए हृदय को ठंडक और सुकून देती है। मन में यह भाव है कि उनके गुणों की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम ही लगेगी। गरुड़ पर सवार कृष्ण की छवि अत्यंत सुंदर लगती है, उनके हाथ में सजी मुरली और उनका तारणहार स्वरूप मन को मोह लेता है। उनके दरबार में झूलते झंडे, सबको बांटी जाने वाली मीठी मनोकामनाएँ, और भक्तों की अर्जी का स्वीकार—यह सब उनके दरबार की विशेषता है।
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श्रृंगार तेरा देखा तो तुझ में खो गया हूँ
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सांवरिया नाम तुम्हारो लागे मन जीते प्यारा
श्रृंगार तेरा देखा तो तुझ में खो गया हूँ
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Author - Saroj Jangir
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