सतगुरु की सेवा सफल है जेको करे चित शबद
सतिगुर की सेवा सफल है जे को करे चित शबद
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜੇ ਕੋ ਕਰੇ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਮਨਿ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਵਣਾ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜੈ ਮੁਕਤਿ ਹੋਇ ਸਚੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਅਲਭੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿ ਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜੇ ਕੋ ਕਰੇ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਮਨਿ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਵਣਾ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜੈ ਮੁਕਤਿ ਹੋਇ ਸਚੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਅਲਭੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿ ਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੧॥
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित लाय,
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
मनि चिंदिआ फलु पावणा,
हउमै विचहु जाइ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
बंधन तोड़ै मुकति होइ,
सचे रहै समाइ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
इसु जग महि नामु अलभु है,
गुरमुखि वसै मनि आइ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
नानक जो गुरु सेवहि आपणा,
हउ तिन बलिहारै जाउ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
जे को करे चित लाय,
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
मनि चिंदिआ फलु पावणा,
हउमै विचहु जाइ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
बंधन तोड़ै मुकति होइ,
सचे रहै समाइ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
इसु जग महि नामु अलभु है,
गुरमुखि वसै मनि आइ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
नानक जो गुरु सेवहि आपणा,
हउ तिन बलिहारै जाउ।।
सतिगुर की सेवा सफल है,
जे को करे चित्त लाय।
श्री गुरु अमरदास जी महाराज का इस साखी से आशय है की सतगुरु की सेवा तभी सार्थक और फलदायी सिद्ध होती है जब साधक पूर्ण एकाग्रता और सच्चे मन से की जाए। चित्त लगाकर, सांसारिक बंधनों को छोड़कर जब कोई सतगुरु की सेवा करता है, उसके मार्गदर्शन में अपने जीवन को चलाता है तो ऐसी सेवा सार्थक है।
इस सेवा के माध्यम से मनुष्य के भीतर की 'हउमै' (अहंकार) का विनाश होता है और उसे उन आत्मिक सुखों की प्राप्ति होती है जिसकी उसका मन अभिलाषा करता है। जब साधक गुरु के चरणों से जुड़ता है, तो उसके माया के बंधन कट जाते हैं, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर उस अविनाशी परमात्मा की जोत में विलीन हो जाता है। यद्यपि इस कलियुग में प्रभु का 'नाम' प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ है, किंतु जो गुरु के सन्मुख होकर 'गुरमुख' बन जाता है, उसके हृदय में यह दिव्य नाम स्वतः ही निवास करने लगता है; अंत में गुरु साहेब का कथन है की मैं उन गुरुसिखों पर बलिहारी जाता हूँ जो अपने सतगुरु की सेवा में लीन रहते हैं।
इस सेवा के माध्यम से मनुष्य के भीतर की 'हउमै' (अहंकार) का विनाश होता है और उसे उन आत्मिक सुखों की प्राप्ति होती है जिसकी उसका मन अभिलाषा करता है। जब साधक गुरु के चरणों से जुड़ता है, तो उसके माया के बंधन कट जाते हैं, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर उस अविनाशी परमात्मा की जोत में विलीन हो जाता है। यद्यपि इस कलियुग में प्रभु का 'नाम' प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ है, किंतु जो गुरु के सन्मुख होकर 'गुरमुख' बन जाता है, उसके हृदय में यह दिव्य नाम स्वतः ही निवास करने लगता है; अंत में गुरु साहेब का कथन है की मैं उन गुरुसिखों पर बलिहारी जाता हूँ जो अपने सतगुरु की सेवा में लीन रहते हैं।
Satgur Ki Sewa Safal Hai [Full Song] Abchal Nagar Gobind Guru Ka
ऐसे ही अन्य भजनों के लिए आप होम पेज / गायक कलाकार के अनुसार भजनों को ढूंढें.
पसंदीदा गायकों के भजन खोजने के लिए यहाँ क्लिक करें।
Original Lyrics
सतिगुर की सेवा सफलु है जे को करे चितु लाय ॥
मन चिंदिआ फलु पावणा हउमै विचहु जाइ ॥
बंधन तोड़ै मुक्ति होइ सचे रहै समाइ ॥
इसु जग महि नामु अलभु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
नानक जि गुरु सेवहि आपणा हउ तिन बलिहारै जाऊ ॥१॥
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜੇ ਕੋ ਕਰੇ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਮਨਿ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਵਣਾ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜੈ ਮੁਕਤਿ ਹੋਇ ਸਚੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਅਲਭੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿ ਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੧॥
यह शबद गुरु ग्रंथ साहिब के अंग ५० पर है। गुरु अमरदास जी ने रचा है। यह महला ३ का सलोक है। सतिगुरु की सेवा चित्त लगाकर करो तो वह फलदायी होती है। यह हउमै नाश करके मन चाहा फल देती है, बंधन तोड़ती है और नाम वसाती है। "हउमै विचहु जाइ" का अर्थ है अहंकार (अपने आपको बड़ा समझना) नाश हो जाता है। सेवा से जीव निर्हंकारी हो जाता है और परमात्मा से जुड़ जाता है। इस जग में नाम अलभ (दुर्लभ) है। यह गुरमुख (गुरु के हुकम में चलने वाले) को ही मन में वसता है और मुक्ति देता है। अंत में गुरु नानक कहते हैं कि जो अपने गुरु की सेवा करते हैं, उन्हें मैं बलिधारी हो जाता हूं। यह गुरु-शिष्ट भावना को दर्शाता है। यह भजन भी देखिये
ऐसे ही अन्य भजनों के लिए आप होम पेज / गायक कलाकार के अनुसार भजनों को ढूंढें.
पसंदीदा गायकों के भजन खोजने के लिए यहाँ क्लिक करें।
सतिगुर की सेवा सफलु है जे को करे चितु लाय ॥
मन चिंदिआ फलु पावणा हउमै विचहु जाइ ॥
बंधन तोड़ै मुक्ति होइ सचे रहै समाइ ॥
इसु जग महि नामु अलभु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
नानक जि गुरु सेवहि आपणा हउ तिन बलिहारै जाऊ ॥१॥
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜੇ ਕੋ ਕਰੇ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਮਨਿ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਵਣਾ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜੈ ਮੁਕਤਿ ਹੋਇ ਸਚੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਅਲਭੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿ ਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੧॥
यह शबद गुरु ग्रंथ साहिब के अंग ५० पर है। गुरु अमरदास जी ने रचा है। यह महला ३ का सलोक है। सतिगुरु की सेवा चित्त लगाकर करो तो वह फलदायी होती है। यह हउमै नाश करके मन चाहा फल देती है, बंधन तोड़ती है और नाम वसाती है। "हउमै विचहु जाइ" का अर्थ है अहंकार (अपने आपको बड़ा समझना) नाश हो जाता है। सेवा से जीव निर्हंकारी हो जाता है और परमात्मा से जुड़ जाता है। इस जग में नाम अलभ (दुर्लभ) है। यह गुरमुख (गुरु के हुकम में चलने वाले) को ही मन में वसता है और मुक्ति देता है। अंत में गुरु नानक कहते हैं कि जो अपने गुरु की सेवा करते हैं, उन्हें मैं बलिधारी हो जाता हूं। यह गुरु-शिष्ट भावना को दर्शाता है। यह भजन भी देखिये
|
Author - Saroj Jangir
इस ब्लॉग पर आप पायेंगे मधुर और सुन्दर भजनों का संग्रह । इस ब्लॉग का उद्देश्य आपको सुन्दर भजनों के बोल उपलब्ध करवाना है। आप इस ब्लॉग पर अपने पसंद के गायक और भजन केटेगरी के भजन खोज सकते हैं....अधिक पढ़ें। |
