हँसा निकल गया काया से खाली भजन
सा निकल गया काया से खाली भजन
जीवड़ा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे वो तस्वीर,
हँसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे तस्वीर,
कई मनाया देवी देवता, कई पुजिया पीर,
आया बुलावा उस घर का रे,जाना पड़ेगा आखिर,
भंवर निकल गया काया से, खाली पड़ी रही तस्वीर,
जीवड़ा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे वो तस्वीर,
हँसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे तस्वीर,
कोई रोवे मल मल रोवे, अरे कोई ओढ़ावे चीर,
चार जणा मिल मतो उपायो, ले गया गंगा तीर,
हँसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रही तस्वीर,
जीवड़ा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे वो तस्वीर,
हँसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे तस्वीर,
यम का दूत लेवण ने आवे, मनड़ो धरयो ना धीर,
मार मार कर प्राण निकाले, नैना बरस्यो नीर,
हँसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रही तस्वीर,
माल खजाना कोई न ले जाए, संग चले ना शरीर,
जाय जंगल चीता लगाईं, कह गए दास कबीर,
हँसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रही तस्वीर,
हंसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे तस्वीर
जीवड़ा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे वो तस्वीर,
हँसा निकल गया काया से, खाली पड़ी रवे तस्वीर,
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जब शरीर से प्राण निकल जाता है, तो वही देह जो कल प्रेम और स्नेह की प्रतीक थी, अब केवल तस्वीर बनकर रह जाती है। संसार में चाहे जितना नाम, धन या वैभव अर्जित किया जाए, अंततः सब यहीं रह जाता है। इस तथ्य को न भक्ति रोक पाती है, न विद्या, न पूजा-पाठ। जब बुलावा आता है, तब सब रिश्ते, सब साधन व्यर्थ हो जाते हैं। यह स्मरण कराता है कि जीवन का मूल्य उसके भोग में नहीं, बल्कि उस चेतना में है जो आत्मा को समझने से आती है।
यही भाव भीतर विनम्रता जगाता है—कि जिस काया को हम अपना मानते हैं, वह केवल क्षणिक आवास है। वह “हँसा” जो उड़ जाता है, वही हमारी असली पहचान है—न देह से बंधी, न सीमाओं से। मृत्यु यहाँ कोई अंत नहीं, बल्कि एक मुक्तिपथ बनकर सामने आती है। जब शरीर अग्नि के हवाले होता है, तो वही अग्नि हमारे अहंकार, लालच और मोह को भस्म करने का संकेत देती है। संसार तो रो भी लेता है, पर आत्मा उस शांति की ओर बढ़ चली होती है, जहाँ न भय है, न भटकाव।
जिस शरीर को हम अपना मानते हैं, जब उससे हमारी चेतना रूपी हंसा निकल जाता है, तो वह बस एक खाली पड़ी तस्वीर बनकर रह जाता है। यह कितनी भी सुंदर क्यों न हो, यह मिट्टी का काया एक क्षण में निर्जीव हो जाती है। यह भाव हमें बताता है कि जीवन भर हमने चाहे कितने भी देवी-देवताओं को मनाया हो या पीर-फकीरों की पूजा की हो, पर जब उस अंतिम घर (यमलोक) से बुलावा आता है, तो किसी की भी शक्ति काम नहीं आती और आखिर में हमें जाना ही पड़ता है। यह अटल नियम हमें सिखाता है कि इस शरीर पर, इसकी सुंदरता पर या इसकी शक्ति पर अहंकार करना पूरी तरह व्यर्थ है।
इस सत्य को जानने के बाद भी, संसार मोह में डूबा रहता है। जब यह जीवन समाप्त होता है, तब कोई छाती पीटकर रोता है, कोई अंतिम वस्त्र पहनाता है, और अंततः चार लोग मिलकर इस शरीर को गंगा किनारे ले जाते हैं। यहाँ हमें समझना चाहिए कि ये सारे क्रियाकलाप केवल रिश्तों का प्रदर्शन हैं, जबकि आत्मा तो पहले ही जा चुकी होती है।
