श्री कृष्ण को रणछोड़ कहने के पीछे क्या कहानी है
श्री कृष्ण जी के द्वारा कालयवन वध की कथा का वर्णन विष्णु पुराण के पंचम अंश से प्राप्त होता है. भगवान कृष्ण ने कालयवन राक्षस का धौलपुर नगरी (राजस्थान) में छल से वध किया था, और इसी घटना के कारण से श्री कृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा था. कालयवन एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस था, जो मथुरा के लोगों को बहुत परेशान करता था. भगवान कृष्ण ने कालयवन को हारने के एक युक्ति बनाई क्योंकि उनको पता था की कालयवन को शिव का वरदान प्राप्त है.
उन्होंने युद्ध के दौरान कालयवन से कहा की यहाँ तो दोनों पक्षों की सेना है, इसमें बहादुरी का कोई प्रदर्शन नहीं है, उनको अकेले में युद्ध करना चाहिए. कालयवन इसके लिए राजी हो गया लेकिन श्री कृष्ण जी ने यहाँ एक छल का सहारा लिया. श्री कृष्ण आगे चलते रहे और पीछे कालयवन भी चलता रहा, एक स्थान पर जब कालयवन ने श्री कृष्ण जी से कहा की अब और कहाँ तक भागोगे, तुम्हे यहीं युद्ध करना होगा, श्री कृष्ण जी ने बड़ी ही चालाकी से कहा की उनको तो कालयवन से डर लगने लगा है और वे आगे होकर भागने लगे. श्री कृष्ण जी ने युक्ति से एक गुफा में प्रवेश किया जहाँ पर मुचकुंद ऋषि पहले से ही विश्राम कर रहे थे.
कालयवन राक्षस कृष्ण का पीछा करते हुए गुफा में जा पहुंचा. श्री कृष्ण जी को पता था की यहाँ पर मुचकुंद ऋषि विश्राम कर रहे हैं, उन्होंने अपना पीताम्बर मुचकुंद पर डाल दिया जिससे कालयवन को लगे की ये श्री कृष्ण ही हैं. काल यवन ने गुफा में आकर पीतांबर वस्त्र देखकर यह सोचा की ये श्री कृष्ण ही हैं और बहुत क्रोधित हो गया. उसने कहा, "रणछोड़-छलिये यहां आकर छुप कर सो गया है!" उसने चिरनिद्रा में सो रहे मुचकुंद महाराज को लात मारकर जगा दिया.
आपको ये पोस्ट पसंद आ सकती हैं मुचकुंद महाराज को गुस्सा आ गया और उन्होंने कालयवन की ओर देखा. कालयवन को देखते ही वह भस्म हो गया. यह वरदान था जो मुचकुंद ऋषि को चिरनिद्रा से जगायेगा वह भस्म हो जाएगा.
इस घटना का उल्लेख श्रीमद भगवत गीता और महाभारत में भी है. आज भी श्रीकृष्ण के पदचिन्हों के निशान हैं और वह गुफा स्थित है जहां पर कृष्ण ने कालयवन राक्षस को छल से मारा था. यही कारण है किस श्री कृष्ण को रणछोड़ कहा जाता है।
जब बर्बरीक के साथ श्री कृष्ण ने किया छल
महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था. भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने अपनी मां को वचन दिया था कि जो भी पक्ष युद्ध में कमजोर होगा, वह उनकी ओर से लड़ेगा, उसकी सहायता करेगा, इसके लिए उन्होंने भगवान शिव की आराधना की और तीन अजेय बाण प्राप्त किए. इस बात का श्री कृष्ण को पता था।
श्रीकृष्ण को इस बात का पता चला तो उन्होंने ब्राह्मण वेष में बर्बरीक के पास गए. श्री कृष्ण जी ने बर्बरीक का मजाक उड़ाया की कैसे वे केवल तीन बाण से महाभारत जैसे वृहद युद्ध को जीत सकता है. बर्बरीक ने उन्हें अपने बाणों के बारे में बताया. श्रीकृष्ण ने कहा कि यदि उनके बाण अजेय हैं तो वह पीपल के पत्तों में छेद करके दिखाएं. बर्बरीक ने बाण चलाया और सभी पत्तों में छेद हो गया, लेकिन एक पत्ता श्री कृष्ण जी ने अपने पाँव के निचे दबा लिया, श्री कृष्ण स्वंय इश्वर थे इसलिए वह बाण उनके पाँव के ही चक्कर काटने लगा। इस पर बर्बरीक को भी पता चल गया की वे स्वंय हरी ही हैं। इसके उपरान्त श्री कृष्ण जी ने बर्बरीक से शीश का दान मांग लिया और उनको वरदान दिया की कलयुग में उनको शीश के दानी के नाम से पूजा जाएगा, और वे श्री कृष्ण जी के ही अवतार होंगे.
महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र के युद्ध के सत्रहवें दिन कर्ण और अर्जुन आमने-सामने थे. दोनों योद्धाओं ने अपने-अपने सर्वश्रेष्ठ बाण चलाए. कर्ण ने अर्जुन को मारने के लिए अपना सबसे शक्तिशाली बाण, नागबाण चलाया. यह बाण अर्जुन के रथ की ओर बढ़ रहा था. अर्जुन को पता था कि अगर यह बाण उसे मारता है तो वह मर जाएगा. उसने श्रीकृष्ण से मदद मांगी. श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ को भूमि में धंसा दिया और इससे नागबाण अर्जुन के रथ से टकरा गया और टूट गया जिससे अर्जुन के प्राण बच गए.
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Author - Saroj Jangir
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