बन्ना रे बागां में झूला घाल्या राजस्थानी सोंग

बन्ना रे बागां में झूला घाल्या राजस्थानी फोक सोंग

बन्ना रे बागां में झूला घाल्या,
बन्ना रे बागां में झूला डाल्या  
म्हारी बन्नी ने, म्हारी लाडी ने, म्हारी बन्नी ने,
झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गजरा
म्हारी लाडी ने झूलण दीज्यो,
बन्ना गेंन गजरा,
बन्ना रे बागां में झूला घाल्या,
बन्ना रे बागां में झूला डाल्या
म्हारी बन्नी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गज़रा,
म्हारी लाडी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गजरा।

बन्ना रे जयपुरिया थे जाइज्यो,
बन्ना रे जयपुरिया थे जाइज्यो,
म्हारी बन्नी रे म्हारी लाडी रे,
म्हारी बन्नी रे रखड़ी ल्याईज्यो बन्ना गेंन गजरा,
म्हारी लाड़ी रे रखडी़ लाइजो बना गेंन गजरा
बन्ना रे बागां में झूला घाल्या,
बन्ना रे बागां में झूला डाल्या,
म्हारी बन्नी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गज़रा,
म्हारी लाडी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गजरा।

बन्ना रे कोटा बूंदी जाइज्यो,
बन्ना रे कोटा बूंदी जाइज्यो,
म्हारी बन्नी रे म्हारी लाडी रे,
म्हारी बन्नी रे लेहरियो लाइज्यो,
बन्ना गेंन गजरा,
म्हारी लाडी रे लेहरियो लाइज्यो,
बन्ना गेंन गजरा
बन्ना रे बागां में झूला घाल्या,
बन्ना रे बागां में झूला डाल्या,
म्हारी बन्नी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गज़रा,
म्हारी लाडी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गजरा।

बन्ना रे चूड़ी घर थे जाइज्यो,
बन्ना रे चूड़ी घर थे जाइज्यो,
म्हारी बन्नी रे म्हारी लाडी रे,
म्हारी बन्नी रे चुड़लो लाइज्यो,
बन्ना गेंन गजरा,
म्हारी लाडी रे चुड़लो लाइज्यो,
बन्ना गेंन गजरा
बन्ना रे बागां में झूला घाल्या,
बन्ना रे बागां में झूला डाल्या,
म्हारी बन्नी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गज़रा,
म्हारी लाडी ने झूलण दीज्यो बन्ना गेंन गजरा।

सांग श्रेणी : राजस्थानी फोक सांग (Rajasthani Folk Song)

Banna Re Bagan Main Jhula Ghalya- Rajasthani Song Seema Mishra

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Banna Re Bagan Main Jhula Ghalya · Seema Mishra
Ghoomar, Vol. 3
℗ Veena Music
Released on: 2001-05-13
Composer: Ramlal Mathur
Lyricist: Traditional
 
यह रचना उस मारवाड़ी लोकभावना को उजागर करती है जहाँ सादगी में प्रेम की गहराई बसती है। बाग़ में झूला झूलती नववधू हो या सफ़र पर निकलता बन्ना—दोनों की आंतरिक लय में एक दूसरे के लिए अपनापन घुला हुआ है। हवा में फूलों की महक की तरह यह संबंध सुगंधित है—जहाँ उपहारों का आदान‑प्रदान कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि स्नेह का प्रतीक बन जाता है। गजरे, लेहरिये, चुड़लों और राखड़ी जैसे वस्त्र और आभूषण केवल भेंट नहीं, भावनाओं की भाषा हैं—एक मन से दूसरे मन तक पहुँचती हुई कोमल अनुभूतियाँ।

ऐसे गीतों में जीवन की सहजता झलकती है। घर‑आँगन में गूंजती स्त्रियों की हँसी, सावन की हरियाली और प्रेम में डूबी प्रतीक्षा—सब मिलकर एक जीवंत चित्र रच देते हैं। यह गीत केवल पति‑पत्नी का संवाद नहीं, बल्कि उस धरती की आत्मा का उत्सव है, जहाँ रिश्ते परंपरा से नहीं, आत्मीयता से सँवरे जाते हैं। जब कोई बन्ना दूर जाता है और साथ कुछ लाने का वादा करता है, तब हर शब्द में चाह और विश्वास का रंग घुला होता है। यही भाव उस गाने की मिट्टी में रचा‑बसा है—जहाँ प्रेम कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन का सहज उत्सव है जो हर बार झूला झूलते हुए, गजरा सजाते हुए फिर से खिल उठता है। 
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