माया हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे

माया हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे

माया माया माया, 
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...
माया माया माया, 
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

कमा-कमा के मैंने माया जोड़ी,
भर दी बैंक की तिजोरी,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

कोठी, बंगला, महल बनाए,
बनवा दी ऊँची हवेली,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

एक रोटी मैंने गाय की बनाई,
वो भी छोटी-छोटी,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

एक रोटी मैंने कुत्ते को दी,
वो भी सबसे छोटी,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

धर्मराज का आया बुलावा,
पीछे-पीछे चल दी,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

धर्मराज जब लेखा मांगे,
क्या करनी कर आई?
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

ना की मैंने साधु सेवा,
ना ही किए पुण्य दान,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

एक बार मौका देना प्रभु जी,
जीवन सफल बनाऊं,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।

नाम जपूं, करूं संतों की सेवा,
हाथों से करूं पुण्य दान,
हरि जी मैं तो माया में फंस गई रे...।।


HARI JI ME TO MAYA ME PHAS GAYI RE

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मानव जीवन में माया का आकर्षण अत्यंत गहरा और प्रभावशाली होता है। सांसारिक संपत्ति, धन, भोग-विलास और भौतिक सुख-सुविधाएँ धीरे-धीरे व्यक्ति को अपने मोहजाल में बाँध लेती हैं। यह माया इतनी आकर्षक होती है कि मनुष्य जीवन की सच्ची दिशा, अपने कर्तव्य और आत्मिक विकास को भूलकर केवल संग्रह, भोग और स्वार्थ में उलझ जाता है। समय के साथ यह मोह और भी गहरा होता जाता है, और व्यक्ति अपने भीतर की करुणा, दया तथा सेवा-भावना से दूर होता चला जाता है। जीवन के अंतिम क्षणों में जब आत्मा को अपने कर्मों का लेखा-जोखा देना पड़ता है, तब यह अनुभूति होती है कि सारा जीवन तो केवल माया के पीछे भागते हुए ही बीत गया।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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