तेरे दरवाजे पे एक अर्जी छोड़ी है भजन

तेरे दरवाजे पे एक अर्जी छोड़ी है भजन


तेरे दरवाजे पे,
एक अर्जी छोड़ी है,
पढ़ लेना ओ बाबा,
ये बहुत ज़रूरी है।।

दर्शन को तेरे आया,
खुद को भुलाया,
पड़ा था जो मेरे मन में,
कह भी ना पाया,
टूटी-फूटी वाणी,
लग सकती अधूरी है,
पढ़ लेना ओ बाबा,
ये बहुत ज़रूरी है।

अकेले में पढ़ना बाबा,
जग ना हंसाना,
नादान की लज्जा को,
प्रेम से निभाना,
‘पंछी’ की तू हरदम,
समझे मजबूरी है,
पढ़ लेना ओ बाबा,
ये बहुत ज़रूरी है।

तेरे दरवाजे पे,
एक अर्जी छोड़ी है,
पढ़ लेना ओ बाबा,
ये बहुत ज़रूरी है।।


Khatu Shyam Bhajan | तेरे दरवाजे एक अर्जी छोड़ी है | Tere darwaje par | kanika grover bhajan

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तेरे दरवाजे पर राखी हुई वह अरदास मेरे भीतर का पूरा बोझ है; शब्द भले टूटे-फूटे हों, पर हर एक सुस्पष्ट ही एक जीवंत पीड़ा और विनती समेटे हुए है। मैंने जो न कह पाया, वह लिफाफे में छुपा हुआ एक आत्मीय राज है — शर्म-सी, नादानी-सी, पर सच्ची उम्मीद से भरी हुई। तू जब उसे पढ़ेगा, तो देखना कि उस कमजोर वाणी के पीछे कितनी निर्भय तृष्णा और किसी के सहारे की तगमगाहट छिपी है; यह अरदास सर झुकाकर नहीं, उम्मीद के साथ रखी गयी है। अकेले में पढ़कर जब तू मेरी नज़रों की असहायियाँ समझेगा तो वह लज्जा भी प्रेम की उष्मा में पिघल जाएगी; तेरे समझने भर से ही जीवन का एक बड़ा हिस्सा ठीक हो जाता है। बस यही चाह है — तू इन पन्नों को उस तरह सुन ले जैसे कोई प्यारा पिता या दयालु मित्र सुनता है; इसीलिए कहना पड़ता है, पढ़ लेना ओ बाबा, यह बेशकीमती और बहुत जरूरी है।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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