भजन बिन काया सुनी सतगुरु बिन कोन्या सरे

भजन बिन काया सुनी सतगुरु बिन कोन्या सरे

भजन बिन काया सूनी,
सतगुरु बिन कोन्या सरे,
गुरुवा बिन कोन्या सरे।।

पाँच तत्वों का बना पिंजरा,
मन काबू ते बहार,
इधर-उधर ने डोल रहा से,
पंछी बन लाचार,
फिरे यो पागल मनवा,
काबू में कौन करे।।

काम, क्रोध, मद, लोभ, तृष्णा,
के-के खेल रचावे,
ना सोवण दे, ना जागण दे,
चित में उचाटी लावे,
माया बन खड़ी अप्सरा,
जाल में कौन घिरे।।

एक तरफ ने नरक कुंड औड़े,
एक ने स्वर्ग द्वारा,
एक तरफ ने काल बली तेरा,
चाले कोना चारा,
लगी औड़े यम की कचहरी,
बोएं तनें उसे भरे।।

गुरु रविदासा घट-घट वासा,
करो हृदय प्रवेश,
दिलावर सिंह शरण तिहारी,
जाऊँ कौन-सा देश,
फँसी मेरी नाव भँवर में,
सतगुरु बिन कोना तिरे।।

भजन बिन काया सूनी,
सतगुरु बिन कोन्या सरे,
गुरुवा बिन कोन्या सरे।।


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Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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