रहीम के दोहे सरल भावार्थ सहित

रहीम के दोहे सरल भावार्थ सहित


रहिमन आँटा के लगे, बाजत है दिन राति।
घिउ शक्‍कर जे खात हैं, तिनकी कहा बिसाति॥

रहिमन उजली प्रकृत को, नहीं नीच को संग।
करिया बासन कर गहे, कालिख लागत अंग॥

रहिमन एक दिन वे रहे, बीच न सोहत हार।
वायु जो ऐसी बह गई, वीचन परे पहार॥

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति।
काटे चाटै स्‍वान के, दोऊ भाँति विपरीति॥

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत॥

रहिमन कबहुँ बड़ेन के, नाहिं गर्व को लेस।
भार धरैं संसार को, तऊ कहावत सेस॥

रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक।
दाँत दिखावत दीन ह्वै, चलत घिसावत नाक॥

रहिमन कहत सुपेट सों, क्‍यों न भयो तू पीठ।
रहते अनरीते करै, भरे बिगारत दीठ॥

रहिमन कुटिल कुठार ज्‍यों, करत डारत द्वै टूक।
चतुरन के कसकत रहे, समय चूक की हूक॥

रहिमन को कोउ का करै, ज्‍वारी, चोर, लबार।
जो पति-राखनहार हैं, माखन-चाखनहार॥

रहिमन खोजे ऊख में, जहाँ रसन की खानि।
जहाँ गॉंठ तहँ रस नहीं, यही प्रीति में हानि॥

रहिमन खोटी आदि की, सो परिनाम लखाय।
जैसे दीपक तम भखै, कज्‍जल वमन कराय॥

रहिमन गली है साँकरी, दूजो ना ठहराहिं।
आपु अहै तो हरि नहीं, हरि तो आपुन नाहिं॥

रहिमन घरिया रहँट की, त्‍यों ओछे की डीठ।
रीतिहि सनमुख होत है, भरी दिखावै पीठ॥

रहिमन चाक कुम्‍हार को, माँगे दिया न देइ।
छेद में डंडा डारि कै, चहै नॉंद लै लेइ॥

रहिमन छोटे नरन सो, होत बड़ो नहीं काम।
मढ़ो दमामो ना बने, सौ चूहे के चाम॥

रहिमन जगत बड़ाई की, कूकुर की पहिचानि।
प्रीति करै मुख चाटई, बैर करे तन हानि॥

रहिमन जग जीवन बड़े, काहु न देखे नैन।
जाय दशानन अछत ही, कपि लागे गथ लेन॥
 
रहिमन आँटा के लगे, बाजत है दिन राति।
घिउ शक्‍कर जे खात हैं, तिनकी कहा बिसाति॥


अर्थ: रहीम कहते हैं कि जो लोग केवल आटे की रोटी खाते हैं, वे दिन-रात मेहनत करते हैं। जबकि जो लोग घी-शक्कर का सेवन करते हैं, उनकी मेहनत की तुलना में आटे की रोटी खाने वालों की मेहनत अधिक मूल्यवान होती है।

रहिमन उजली प्रकृत को, नहीं नीच को संग।
करिया बासन कर गहे, कालिख लागत अंग॥


अर्थ: रहीम कहते हैं कि स्वाभाविक रूप से उज्ज्वल चरित्र वाले व्यक्ति को नीच संगति से बचना चाहिए। जैसे काले बर्तन को पकड़ने से हाथ में कालिख लग जाती है, वैसे ही बुरी संगति से अच्छे व्यक्ति का चरित्र भी प्रभावित होता है।

रहिमन एक दिन वे रहे, बीच न सोहत हार।
वायु जो ऐसी बह गई, वीचन परे पहार॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि एक समय था जब मोती माला में सुशोभित थे, लेकिन जब तेज हवा चली, तो वे बिखरकर पर्वतों पर जा गिरे। अर्थात, समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, और जो कभी महत्वपूर्ण था, वह अब अप्रासंगिक हो सकता है।

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति।
काटे चाटै स्‍वान के, दोऊ भाँति विपरीति॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि नीच व्यक्तियों से न तो मित्रता अच्छी है और न ही शत्रुता। जैसे कुत्ता जिसे काटता है, फिर उसी घाव को चाटता है; दोनों ही स्थितियाँ अनुचित हैं।

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि चिंता चिता से भी अधिक भयानक है। चिता तो केवल निर्जीव शरीर को जलाती है, लेकिन चिंता जीवित व्यक्ति को अंदर से जलाती रहती है।

रहिमन कबहुँ बड़ेन के, नाहिं गर्व को लेस।
भार धरैं संसार को, तऊ कहावत सेस॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि महान व्यक्तियों में कभी भी गर्व नहीं होता। जैसे शेषनाग पूरे संसार का भार उठाते हैं, फिर भी उन्हें अहंकार नहीं होता।
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