जोगी पर्वत पे बैठा बैठा ध्यान धरे
जोगी पर्वत पे बैठा बैठा ध्यान धरे
ध्यान धरे,
रखता सबकी खबर,
कल्याण करे,
जोगी पर्वत पे बैठा बैठा,
ध्यान धरे।।
जाने उसको लगी है जी,
किसकी लगन,
बैठा कैलाश पर,
करता किसका भजन,
आंख मूंद के वो तो,
राम राम करे,
जोगी पर्वत पे बैठा बैठा,
ध्यान धरे।।
देवों का देव,
अंतर्यामी है वो,
सबकी झोली है भरता,
भोले दानी है वो,
जिसका सारा जगत,
गुणगान करे,
जोगी पर्वत पे बैठा बैठा,
ध्यान धरे।।
मेरी गौरा मैया का,
श्रृंगार है वो,
'उर्मिल' सृष्टि का,
पालनहार है वो,
जिसकी महिमा का,
वेद बखान करे,
जोगी पर्वत पे बैठा बैठा,
ध्यान धरे।।
जोगी पर्वत पे बैठा बैठा,
ध्यान धरे,
रखता सबकी खबर,
कल्याण करे,
जोगी पर्वत पे बैठा बैठा,
ध्यान धरे।।
रखते सबकी खबर भोलेनाथ-रखते सबकी खबर भोलेनाथ𝐒𝐚𝐰𝐚𝐧 𝐒𝐨𝐧𝐠 𝕊𝕒𝕨𝕒𝕟 𝕊𝕡𝕖𝕔𝕚𝕒𝕝 𝕊𝕙𝕚𝕧 𝔹𝕙𝕒𝕛𝕒𝕟 𝟚𝟘𝟚𝟜🔱🔱𝐒𝐡𝐢𝐯 𝐉𝐢 𝐊𝐞 𝐁𝐡𝐚𝐣𝐚𝐧
Title: Jogi Parvat Pe Baitha Baitha Dhyan Dhare
Singer: Saurabh Madhukar & Keshav Madhukar (Kolkata)
Lyricist: Pradeep (Urmil Ji)
Music Label: Sur Sourav Industries
ध्यान में लीन भोलेनाथ का यह भाव हमें उनकी दिव्यता से जोड़ता है। संसार की गति के परे, वे एकांत में ध्यान धारण करते हैं, परंतु उनकी चेतना समस्त लोकों में व्याप्त होती है। उनका मौन, उनकी गहराई, उनकी कृपा—यह सब भक्त के हृदय में गूंजती है, और हमें उनके असीम प्रेम का अनुभव कराती है।
वह दानी हैं, वह अंतर्यामी हैं—जो बिना कहे ही सबकी पुकार सुनते हैं। भक्तों की झोली भरने वाले, समस्त सांसारिक भ्रम को दूर करने वाले, शिवजी की भक्ति केवल पूजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह एक अद्वितीय अनुभूति बन जाती है।
सुन्दर भजन में गौरा मैया के प्रति उनकी प्रीत, सृष्टि के संचालन में उनकी भूमिका, और वेदों द्वारा गायी गई उनकी महिमा स्पष्ट रूप से उभरती है। यह भक्ति की वह अवस्था है, जहाँ मन शिवजी के ध्यान में डूब जाता है, और आत्मा को उनके असीम शांति में विश्राम मिलता है।
भगवान शिव को भोलेनाथ, योगी तपस्वी और आदि पुरुष कहा जाता है, इसके पीछे गहरे पौराणिक और दार्शनिक कारण हैं। शिव को भोलेनाथ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे अत्यंत सरल, निष्कपट और दयालु हैं। वे अपने भक्तों की सच्ची भक्ति और भावना से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। शिव के लिए कोई बड़ा अनुष्ठान या दिखावा आवश्यक नहीं है, वे केवल जल अर्पण करने से भी प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी इसी सरलता और सहजता के कारण उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है।
शिव का स्वरूप एक महान योगी और तपस्वी का है। वे संसार के मोह-माया से दूर, ध्यान और समाधि में लीन रहते हैं। शिव की जटाएं, भस्म, त्रिशूल, और श्मशान में निवास करना, यह सब उनके विरक्त और तपस्वी स्वरूप को दर्शाता है। वे योग और तपस्या के आदर्श हैं। शिव को आदियोगी भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले योग का ज्ञान पार्वती और सप्तऋषियों को दिया था। उनके जीवन का यह पक्ष दर्शाता है कि वे केवल देवता नहीं, बल्कि योग के प्रथम गुरु भी हैं, जिनसे योग और ध्यान की परंपरा का आरंभ हुआ।
शिव को आदि पुरुष भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है सृष्टि के आरंभ में विद्यमान पुरुष। वे अनादि और अनंत हैं, यानी जिनका कोई आदि या अंत नहीं है। शिव को सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार का अधिपति माना गया है। जब कुछ भी नहीं था, तब भी शिव थे और जब कुछ भी नहीं रहेगा, तब भी शिव ही रहेंगे। उनका यह स्वरूप उन्हें सनातन, सर्वव्यापी और सृष्टि के मूल कारण के रूप में स्थापित करता है।
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