सानू वृन्दावन अपने बुला लै भजन

सानू वृन्दावन अपने बुला लै भजन


ओ सानूं वृन्दावन अपने बुला लै,
मैं नचांगी मीरा बन के...
मैं नचांगी मीरा बन के...

जिन्हां नूं श्याम दिया आन चिट्ठियां,
ओह्नां नूं मिलण मुरादा मिठियां।
मैंनूं चरनां दी धूल बना लै,
मैं नचांगी मीरा बन के...
ओ सानूं वृन्दावन अपने बुला लै...

सानूं सतान श्यामा यादां तेरियां,
साड़ी वारी तुसी काहनूं लाईया देरियां।
सानूं यमुना दिया लहरां च मिला लै,
मैं नचांगी मीरा बन के...
ओ सानूं वृन्दावन अपने बुला लै...

भगत बुलांदे प्रभु कदे ना भुलांदे,
ओखे वेले सारे कम आन के सवांरदे।
वृन्दावन दी नौकर बना लै,
मैं नचांगी मीरा बन के...
ओ सानूं वृन्दावन अपने बुला लै...


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वृन्दावन बुलावे की पुकार में मीरा-भाव की गहराई है। यह वह तड़प है, जहाँ मन चाहता है कि कृष्ण के धाम में जाकर उसी भक्ति, उसी समर्पण, उसी प्रेम में डूब जाए, जैसे मीरा ने अपने मोहन के लिए सब कुछ त्याग दिया था। मीरा की तरह नाचने की चाह, अपने आप को कृष्ण के चरणों में समर्पित करने की ललक है—जहाँ तन-मन-धन, लोक-लाज, कुल-परंपरा सब पीछे छूट जाते हैं और बस कृष्ण-प्रेम ही शेष रह जाता है।

श्याम की चिट्ठी (कृपा, बुलावा) जिनको मिलती है, उनके सारे मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं; मन यही चाहता है कि चरणों की धूल बन जाए, सेवा में जीवन बीते, और मीरा की तरह प्रेम में नाचे। इंतजार की पीड़ा है—श्यामा की यादें सताती हैं, मन प्रश्न करता है कि अब तक बुलावा क्यों नहीं आया, कब यमुना की लहरों में मिलन होगा, कब वृन्दावन की गलियों में रास होगा।

यह विश्वास भी है कि जो सच्चे भाव से पुकारता है, प्रभु कभी नहीं भूलते—कठिन समय में आकर संवार देते हैं, अपने धाम में स्थान देते हैं। वृन्दावन की सेवा, चरणों की धूल, और मीरा-सा प्रेम—यही सबसे बड़ी साधना और सबसे मधुर तृप्ति है।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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