एहि बिधि सकल जीव जग रोगी उत्तर काण्ड

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी उत्तर काण्ड

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।
मानक रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।।
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।
राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा।।
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।।
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।।
सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।
सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।।
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।।
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।।
फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।।
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।।
अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।।
हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।।
दो0=बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।।
मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन।।122(ख)।।
श्लोक- विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।122(ग)।।
 
सारे जीव शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के रोगों से ग्रस्त हैं। कुछ मानसिक रोग बताए गए हैं, जो सबमें होते हैं पर कम लोग समझ पाते हैं। जानने से पापी थोड़ा कमजोर होते हैं, पर दुख देने वाले जीव नाश नहीं पाते। विषय रूपी गलत आहार से ये रोग बढ़ते हैं, जो मुनियों और गरीबों के हृदय में भी अंकुरित हो जाते हैं। राम की कृपा से सारे रोग नष्ट होते हैं, जब सदगुरु रूपी वैद्य पर विश्वास, संयम रूपी परहेज और विषयों की आशा छोड़ने का संयोग बने। राम भक्ति सजीवनी जड़ी है, जिसे श्रद्धा और बुद्धि से लेना चाहिए। इससे रोग नष्ट होते हैं, वरना करोड़ों प्रयास से भी नहीं जाते।

मन तब स्वस्थ माना जाता है, जब हृदय में वैराग्य बढ़े, अच्छी भूख जगे, विषयों की चाह कमजोर हो और ज्ञान रूपी जल से नहाने पर राम भक्ति हृदय में बस जाए। शिव, ब्रह्मा, शुक, सनक और नारद जैसे मुनि कहते हैं कि राम के चरणों में प्रेम करना चाहिए। वेद, पुराण और ग्रंथ कहते हैं कि राम भक्ति बिना सुख नहीं मिलता।

चाहे कछुआ पीठ पर बारह जन्म ले, बंध्या को पुत्र हो, आकाश में फूल खिलें, मृगतृष्णा से प्यास बुझे, चंद्रमा सिर पर विषधर धारण करे, सूरज अंधेरा कर दे, या बर्फ से आग निकले—राम से विमुख जीव को सुख नहीं मिलता। पानी से घी, रेत से तेल नहीं निकलता, वैसे ही हरि भजन बिना संसार नहीं तरता। मच्छर को ब्रह्मा और ब्रह्मा को मच्छर बनाने वाला राम ही है, इसलिए संदेह छोड़कर प्रबुद्ध लोग राम को भजते हैं। जो हरि को भजते हैं, वे कठिन संसार को पार कर जाते हैं।
 

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।।
श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।।
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही।।
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।।
पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।।
सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।।
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।।
सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।।
दो0-आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।।
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ।
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ।।123।।
 
मैंने अपनी समझ से राम के अनुपम चरित्र को व्यास की तरह संक्षेप में कहा। वेदों का सिद्धांत यही है कि सारे काम छोड़कर राम को भजना चाहिए। रघुपति को छोड़कर किसकी सेवा करूँ? मुझसे मूर्ख पर उनकी ममता है। तुम ज्ञान के रूप हो, मोह से मुक्त, और मुझ पर तुमने बहुत कृपा की। मैं राम की पवित्र कथा पूछता हूँ, जो शुक, सनक और शिव के मन को भाती है। संसार में संतों का संग दुर्लभ है, एक पल का भी मूल्य है। अपने हृदय में देखता हूँ, क्या मैं रघुवीर का भजन करने योग्य हूँ? मैं नीच और अपवित्र था, पर प्रभु ने मुझे जगत में पवित्र बनाया। आज मैं धन्य हूँ, हालाँकि हर तरह से हीन हूँ, पर राम ने मुझे अपना मानकर संतों के संग का दान दिया। मैंने जैसी बुद्धि से कहा, कुछ छिपाया नहीं, पर राम के चरित्र रूपी सागर की थाह कौन पा सकता है?

राम का भजन ही सर्वोत्तम है, उनकी कथा पवित्र और संतों का संग दुर्लभ है; राम ने मुझ नीच को भी अपने मानकर धन्य किया, पर उनके चरित्र की गहराई अथाह है।
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