सांवरो नन्द नन्दन दीठ पड्याँ माई लिरिक्स
सांवरो नन्द नन्दन, दीठ पड्याँ माई।
डार्यां सब लोक लाज सुध बुध बिसराई।
मोर चन्द्रका किरीट मुगट जब सोहाई।
केसर रो तिलक भाल लोचन सुखदाई।
कुण्डल झलकाँ कपोल अलकाँ लहराई।
मीणा तज सरवर ज्यों मकर मिलन धाई।
नटवर प्रभु भेष धर्यां रूप जग लोभाई।
गिरधर प्रभु अंग अंग, मीरा बलि जाई।।
(नन्दनन्दन=कृष्ण, दीठ=दृष्टि, चन्द्रका= पंख, कीरीट=मुकुट, अलकाँ=लटें, मीणा= मीन,मछली, सरवर=तालाब, मकर=मगर)मीराबाई का भजन "सांवरो नन्द नन्दन, दीठ पड्याँ माई" उनके श्रीकृष्ण के प्रति गहरे प्रेम और भक्ति को व्यक्त करता है। इस भजन में मीराबाई श्रीकृष्ण की सुंदरता का वर्णन करती हैं, जो उनके हृदय में बसी हुई है। वह कहती हैं कि श्रीकृष्ण का ध्यान उनके मन और प्राणों में निरंतर बसा हुआ है।
मीराबाई अपने प्रिय श्रीकृष्ण के बिना अपने जीवन की कठिनाईयों का वर्णन करती हैं। वह कहती हैं कि उनके बिना उनका जीवन अधूरा है और वह उनके बिना कहीं भी नहीं जा सकतीं।
यहां मीराबाई अपने प्रिय श्रीकृष्ण से कहती हैं कि वह कब उनके दर्शन करेंगे, ताकि उनकी नित्य नवीन प्रेम रस से तृप्ति हो सके।