हरि म्हारो सुणज्यो अरज महाराज लिरिक्स

हरि म्हारो सुणज्यो अरज महाराज लिरिक्स

हरि म्हारो सुणज्यो, अरज महाराज।
मैं अबल बल नाहिं, गोसाई; राखो अबके लाज।
रावरी होइ कणीरे जाऊँ, है हरि हिवडारो साज।
हयको वपु धरि दैते संघार्यो, सार्यों देवन को काज।
मीराँ के प्रभु और न कोई, तुम मेरे सिरताज।।
(अरज=बिनती, रावरी होई=तुम्हारी होकर,

कणी रे=कहाँ पर, हिवडारो=हृदय का, साज= शोभा, हय=हयग्रीव, वपु=शरीर, दैत=दैत्य, राक्षस, संघार्यो=मारा, सार्यौ=सिद्ध किया, सिरताज=स्वामी)
 
पद का भावार्थ:
मीराबाई भगवान श्रीकृष्ण से विनम्र प्रार्थना करती हैं कि वे उनकी अरज (विनती) सुनें। वह स्वयं को अबला (निर्बल) मानती हैं और कहती हैं कि उनके पास कोई बल नहीं है, इसलिए हे गोसाईं (स्वामी), इस समय उनकी लाज (मर्यादा) रखें। वह कहती हैं कि आपकी होकर, मैं कहाँ जाऊँ? हरि (भगवान) ही उनके हृदय की शोभा हैं। आपने हयग्रीव का रूप धारण कर दैत्यों (राक्षसों) का संहार किया और देवताओं का कार्य सिद्ध किया। मीराबाई कहती हैं कि उनके प्रभु गिरधर नागर के अलावा उनका और कोई नहीं है; वही उनके सिरताज (स्वामी) हैं।

पद की व्याख्या:
इस पद में मीराबाई भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और समर्पण को प्रकट करती हैं। वह स्वयं को निर्बल और असहाय मानती हैं, जिन्हें संसार में कोई आश्रय नहीं है। इसलिए, वह भगवान से प्रार्थना करती हैं कि वे उनकी रक्षा करें और उनकी लाज रखें। मीराबाई भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए कहती हैं कि उन्होंने हयग्रीव का रूप धारण कर दैत्यों का संहार किया और देवताओं की सहायता की। अंत में, वह स्वीकार करती हैं कि उनके जीवन में भगवान श्रीकृष्ण के अलावा और कोई नहीं है, और वही उनके स्वामी हैं।

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