पांहण केरा पूतला करि पूजै करतार मीनिंग
पांहण केरा पूतला करि पूजै करतार मीनिंग
पांहण केरा पूतला, करि पूजै करतार।
इही भरोसै जे रहे, ते बूड़े काली धार॥
इही भरोसै जे रहे, ते बूड़े काली धार॥
Pahan Kera Putala, kari Puje Kartar,
Ehi Bharose Je Rah, Te Bude Kali Dhara.
पांहण केरा पूतला : पत्थर का पुतला.
करि पूजै करतार : इश्वर समझ कर इसकी पूजा करते हैं.
इही भरोसै जे रहे : इनके ही भरोसे जो रहता है.
ते बूड़े काली धार : वह काल की धारा में डूब जाता है.
करि पूजै करतार : इश्वर समझ कर इसकी पूजा करते हैं.
इही भरोसै जे रहे : इनके ही भरोसे जो रहता है.
ते बूड़े काली धार : वह काल की धारा में डूब जाता है.
पत्थर को जो इश्वर समझते हैं, पत्थर के पुतले को जो लोग इश्वर समझते हैं, पत्थर के पुतले को इश्वर समझ कर उसकी पूजा करते हैं उनके ऊपर कबीर साहेब की वाणी है की जो पत्थर की पूजा करते हैं, पत्थर को ही इश्वर समझ लेते हैं वे यदि इसी भरोसे पर रहे तो अवश्य की काल की धारा में बह जाते हैं.
प्रस्तुत साखी में मूर्तिपूजा का खंडन किया है, मूर्तिपूजा एक तरह का पाखंड है जिससे व्यक्ति को भक्ति प्राप्त नहीं होनी चाहिए. मुक्ति तो सच्ची भक्ति से ही प्राप्त की जा सकती है. सच्ची भक्ति से साहेब का आशय है की तमाम तरह के कर्मकांड का त्याग करके, हृदय से हरी के नाम का सुमिरन ही मुक्ति का मार्ग है. तीर्थ करना, मूर्तिपूजा आदि दिखावे की भक्ति है जिसका वास्तविक भक्ति से कुछ भी लेना देना नहीं है. मूर्तिपूजा से पंडित को भले ही आर्थिक लाभ मिल जाए लेकिन साधक को कोई फायदा नहीं होने वाला है.
प्रस्तुत साखी में मूर्तिपूजा का खंडन किया है, मूर्तिपूजा एक तरह का पाखंड है जिससे व्यक्ति को भक्ति प्राप्त नहीं होनी चाहिए. मुक्ति तो सच्ची भक्ति से ही प्राप्त की जा सकती है. सच्ची भक्ति से साहेब का आशय है की तमाम तरह के कर्मकांड का त्याग करके, हृदय से हरी के नाम का सुमिरन ही मुक्ति का मार्ग है. तीर्थ करना, मूर्तिपूजा आदि दिखावे की भक्ति है जिसका वास्तविक भक्ति से कुछ भी लेना देना नहीं है. मूर्तिपूजा से पंडित को भले ही आर्थिक लाभ मिल जाए लेकिन साधक को कोई फायदा नहीं होने वाला है.
जो व्यक्ति केवल मूर्तिपूजा में ही लगा रहता है वह अवश्य ही काल का भागी बनता है. प्रस्तुत साखी में मूर्तिपूजा की असारता को बताया गया है. साखी में उपमा अलंकारका उपयोग हुआ है.
कबीर दास ने अपने दोहों और कविताओं के माध्यम से मूर्ति पूजा का विरोध किया। उनका मानना था कि जिस भगवान को हम अपनी उंगलियों से छू नहीं सकते, हम उनकी मूर्ति बनाकर उनकी पूजा कैसे कर सकते हैं। मूर्ति पूजा पर उनके कुछ विचार इस प्रकार हैं:
पांहण केरा पूतला, करि पूजै करतार।
इही भरोसै जे रहे, ते बूड़े काली धार॥
Paanhan Kera Pootala, Kari Poojai Karataar.
Ihee Bharosai Je Rahe, Te Boode Kaalee Dhaar.
कर्मकांड और दिखावे की भक्ति करने वाले पर व्यंग्य है की पत्थर की मूर्ति बना कर/पुतला बना कर लोग उसे ईश्वर के रूप में पूजते हैं। यदि ऐसे लोग ऐसे ही चलते रहे तो वे काली धार / मझधार में डूब जायेंगे। भाव है की परम ब्रह्म निराकार है, उसका कोई रूप रंग नहीं है और वह कण कण में व्याप्त है। यह हृदय की शुद्धता को देखता है, आचरण की शुद्धता को परखता है। मात्र पत्थर की मूर्ति बना कर इसे पूजने पर कोई लाभ नहीं होने वाला है। यहाँ कबीर साहेब ने मूर्तिपूजा का विरोध किया है।
काजल केरी कोठरी, मसि के कर्म कपाट।
पांहनि बोई पृथमी, पंडित पाड़ी बाट॥
Kaajal Keree Kotharee, Masi Ke Karm Kapaat.
Paanhani Boee Prthamee, Pandit Paadee Baat.
यह संसार काजल की कोठरी के समान ही और इसके कालिक (काला) दरवाजे लगे हैं। स्वार्थी पंडितों ने इस पृथ्वी को पत्थरों की मूर्तियों से ढक दिया है मानो वे इसी मार्ग से चलकर मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं। यह पंडितों का ढोंग है की वे मूर्ति पूजा को ही सबकुछ मानते हैं जबकि व्यक्ति अपने कर्मों के आधार पर और हृदय से ईश्वर के सुमिरण उपरान्त ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।
पाँहिन कूंका पूजिए, जे जनम न देई जाब।
आँधा नर आसामुषी, यौंही खोवै आब॥
Paanhin Koonka Poojie, Je Janam Na Deee Jaab.
Aandha Nar Aasaamushee, Yaunhee Khovai Aab.
मूर्तिपूजा का खंडन करते हुए साहेब की वाणी है की ऐसे पत्थर को पूजने से क्या लाभ जो जनम भर जवाब ही नहीं देती है। नर पूरी जिंदगी आशा के साथ अँधा होकर मूर्ति पूजा करता है लेकिन उसकी पूजा का कोई लाभ नहीं होता है। वस्तुतः साहेब ने अपने आचरण और मन की शुद्धता पर ध्यान देने पर बल दिया है। व्यक्ति मूर्ति पूजा करके प्रशन्न हो जाते हैं की वे ईश्वर की स्तुति कर रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है, जब तक हृदय से भक्ति नहीं की जायेगी कोई लाभ होने वाला नहीं है। पाखंड और बाह्याचार का भक्ति मार्ग में कोई स्थान नहीं है।
हम भी पाहन पूजते, होते रन के रोझ।
सतगुर की कृपा भई, डार्या सिर थैं बोझ॥
Ham Bhee Paahan Poojate, Hote Ran Ke Rojh.
Sataguकिसीr Kee Krpa Bhee, Daarya Sir Thain Bojh.
यदि हम भी पत्थरों की मूर्तियों की पूजा करते तो हम भी युद्ध में भार दोने वाले गधे के समान होते लेकिन हम पर तो सतगुरु की कृपा हो गई है जिससे हम इस बोझ से उतर गए हैं। भाव है की मूर्ति पूजा को बगैर तार्किकता के सर्वोच्च मानना कोई समझदारी का कार्य नहीं है और सतगुरु ही हमें ईससे पार लगाता है।
- कबीर दास कहते हैं कि हमें मूर्ति पूजा की बजाय अपने आचरण और आध्यात्मिक ज्ञान पर ध्यान देना चाहिए।
- "पोथी पड़ी पड़ी जग मुआ, पंडित भाया ना कोई। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई।" -कबीर दास का मानना था कि किताबें पढ़ने से प्राप्त ज्ञान पर्याप्त नहीं है। सच्चा ज्ञान परमेश्वर के प्रेम से प्राप्त होता है, जो किसी को भी बुद्धिमान बना सकता है।
- "जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा सायी तुझ में है, तू जाग सके तो जाग।" - कबीर दास भगवान और उनके भक्त के बीच के रिश्ते की तुलना तेल और तिल या आग और चकमक के बीच के रिश्ते से करते हैं। उनका मानना है कि ईश्वर हमारे भीतर निवास करते हैं और यदि हम अपनी आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर लें तो हम उनकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं।
- "जो तो को कहे, दुख होए। जो तो कहे सुख होए।" - कबीर दास कहते हैं कि अगर हम किसी मूर्ति की पूजा करते हैं, तो इससे हमें खुशी मिल भी सकती है और नहीं भी। लेकिन अगर हम अपने भीतर मौजूद ईश्वरीय शक्ति से प्रार्थना करें, तो इससे हमें खुशी जरूर मिलेगी।
- "मन चंगा तो कठौती में गंगा।" - कबीर दास का मानना था कि अनुष्ठान या मूर्ति पूजा करने की तुलना में हृदय की पवित्रता अधिक महत्वपूर्ण है। यदि हमारा मन शुद्ध और सदाचारी है, तो हम सबसे अशुद्ध स्थानों में भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
पांहण केरा पूतला, करि पूजै करतार।
इही भरोसै जे रहे, ते बूड़े काली धार॥
Paanhan Kera Pootala, Kari Poojai Karataar.
Ihee Bharosai Je Rahe, Te Boode Kaalee Dhaar.
कर्मकांड और दिखावे की भक्ति करने वाले पर व्यंग्य है की पत्थर की मूर्ति बना कर/पुतला बना कर लोग उसे ईश्वर के रूप में पूजते हैं। यदि ऐसे लोग ऐसे ही चलते रहे तो वे काली धार / मझधार में डूब जायेंगे। भाव है की परम ब्रह्म निराकार है, उसका कोई रूप रंग नहीं है और वह कण कण में व्याप्त है। यह हृदय की शुद्धता को देखता है, आचरण की शुद्धता को परखता है। मात्र पत्थर की मूर्ति बना कर इसे पूजने पर कोई लाभ नहीं होने वाला है। यहाँ कबीर साहेब ने मूर्तिपूजा का विरोध किया है।
काजल केरी कोठरी, मसि के कर्म कपाट।
पांहनि बोई पृथमी, पंडित पाड़ी बाट॥
Kaajal Keree Kotharee, Masi Ke Karm Kapaat.
Paanhani Boee Prthamee, Pandit Paadee Baat.
यह संसार काजल की कोठरी के समान ही और इसके कालिक (काला) दरवाजे लगे हैं। स्वार्थी पंडितों ने इस पृथ्वी को पत्थरों की मूर्तियों से ढक दिया है मानो वे इसी मार्ग से चलकर मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं। यह पंडितों का ढोंग है की वे मूर्ति पूजा को ही सबकुछ मानते हैं जबकि व्यक्ति अपने कर्मों के आधार पर और हृदय से ईश्वर के सुमिरण उपरान्त ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।
पाँहिन कूंका पूजिए, जे जनम न देई जाब।
आँधा नर आसामुषी, यौंही खोवै आब॥
Paanhin Koonka Poojie, Je Janam Na Deee Jaab.
Aandha Nar Aasaamushee, Yaunhee Khovai Aab.
मूर्तिपूजा का खंडन करते हुए साहेब की वाणी है की ऐसे पत्थर को पूजने से क्या लाभ जो जनम भर जवाब ही नहीं देती है। नर पूरी जिंदगी आशा के साथ अँधा होकर मूर्ति पूजा करता है लेकिन उसकी पूजा का कोई लाभ नहीं होता है। वस्तुतः साहेब ने अपने आचरण और मन की शुद्धता पर ध्यान देने पर बल दिया है। व्यक्ति मूर्ति पूजा करके प्रशन्न हो जाते हैं की वे ईश्वर की स्तुति कर रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है, जब तक हृदय से भक्ति नहीं की जायेगी कोई लाभ होने वाला नहीं है। पाखंड और बाह्याचार का भक्ति मार्ग में कोई स्थान नहीं है।
हम भी पाहन पूजते, होते रन के रोझ।
सतगुर की कृपा भई, डार्या सिर थैं बोझ॥
Ham Bhee Paahan Poojate, Hote Ran Ke Rojh.
Sataguकिसीr Kee Krpa Bhee, Daarya Sir Thain Bojh.
यदि हम भी पत्थरों की मूर्तियों की पूजा करते तो हम भी युद्ध में भार दोने वाले गधे के समान होते लेकिन हम पर तो सतगुरु की कृपा हो गई है जिससे हम इस बोझ से उतर गए हैं। भाव है की मूर्ति पूजा को बगैर तार्किकता के सर्वोच्च मानना कोई समझदारी का कार्य नहीं है और सतगुरु ही हमें ईससे पार लगाता है।
जेती देषौं आत्मा, तेता सालिगराँम।
साथू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सू काँम॥
Jetee Deshaun Aatma, Teta Saaligaraanm.
Saathoo Pratashi Dev Hain, Nahin Paathar Soo Kaanm.
इस संसार में जितनी आत्माएं हैं उतनी ही शालिग्राम की मूर्तियाँ हैं साधू तो स्वंय ही देवता हैं तो उन्हें किसी और देव की पूजा का क्या लाभ है। प्रत्येक व्यक्ति अलग अलग देवों की पूजा करते हैं। यहाँ मूर्ति पूजा का खंडन कर यह सन्देश देने का प्रयास किया गया है की ईश्वर किसी मूर्ति में नहीं अपितु सदाचार, हृदय की शुद्धता में होता है।
सेवैं सालिगराँम कूँ, मन की भ्रांति न जाइ।
सीतलता सुषिनै नहीं, दिन दिन अधकी लाइ॥
Sevain Saaligaraanm Koon, Man Kee Bhraanti Na Jai.
Seetalata Sushinai Nahin, Din Din Adhakee Lai.
मूर्तिपूजा के सबंध में ही वाणी है की जो लोग मूर्तिपूजा करते हैं उनका मन अशांत रहता है, उनका चित्त शांत नहीं रहता है, वस्तुतः वे एक भ्रम में जी रहे होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के चित्त में शान्ति नहीं रहती है, वे सपने में भी शांत नहीं होते हैं और दिन प्रतिदिन अधिक शांत होते जाते हैं।
सेवैं सालिगराँम कूँ, माया सेती हेत।
बोढ़े काला कापड़ा, नाँव धरावैं सेत॥
Sēvaiṁ Sāligarām̐ma Kūm̐, Māyā Sētī Hēta.
Bōṛhē Kālā Kāpaṛā, Nām̐va Dharāvaiṁ Sēta.
लोग पत्थर की मूर्ति की पूजा करते हैं और माया से भी प्रेम करते हैं लेकिन इसका साहेब ने खंडन किया है और कहा है की माया से हेत करने वाले ही मूर्तिपूजा करते हैं। ये लोग ऐसे ही हैं जैसे वे काले कपडे पहने और मूर्तिपूजा करके स्वेत नांव के माध्यम से भव सागर को पार कर लें। ढोंग और पाखण्ड करने से ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है और यह भक्ति मार्ग भी नहीं है।
जप तप दीसै थोथरा, तीरथ ब्रत बेसास।
सूवै सैबल सेविया, यों जग चल्या निरास॥
Jap Tap Deesai Thothara, Teerath Brat Besaas.
Soovai Saibal Seviya, Yon Jag Chalya Niraas.
जप तप आदि कर्म व्यर्थ ही हैं। तीर्थ और व्रत आदि भी कोई महत्त्व नहीं रखते हैं और ऐसे व्यक्तियों को ऐसे ही निराशा हाथ लगती है जैसे सेंवर के फूल के चोंच मारने पर तोते को निराशा ही हाथ लगती है, उसका प्रयोजन शिद्ध नहीं होता है। कर्मकांड सभी निरर्थक है जब तक सद्मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति हृदय से हरी का सुमिरण नहीं करे। इस दोहे में उपमा अलंकार का उपयोग किया गया है।
तीरथ त सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ।
कबीर मूल निकंदिया, कोण हलाहल खाइ॥
Teerath Ta Sab Beladee, Sab Jag Melya Chhai.
Kabeer Mool Nikandiya, Kon Halaahal Khai.
कर्मकांड यथा तीर्थ आदि से कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला है, तीर्थ तो एक विष की बेल है जो पुरे संसार पर छाई हुई है। साहेब ने इसकी जड़ को ही उखाड़ कर फ़ेंक दिया है अब लोग कैसे इसके विषाक्त फलों को खा सकते हैं, भाव है की संसार इसके दुष्परिणामों से बच गया है। वस्तुतः जब तक हृदय में शुद्धता नहीं है, आचरण सत्य आधारित नहीं है और व्यक्ति में मानवीय गुण यथा दया नहीं है तो वह व्यक्ति धार्मिक कैसे कहा जा सकता है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए चित्त का पवित्र होना आवश्यक है।
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाँणि।
दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछाँणि॥
Man Mathura Dil Dvaarika, Kaaya Kaasee Jaanni.
Dasavaan Dvaara Dehura, Taamai Joti Pichhaanni.
यह शरीर ही मथुरा और काशी के समान है और इसका दशम द्वार ही ब्रह्माण्ड रूपी मंदिर है जिसमे पवित्र ज्योति को पहचानने की आवश्यकता है। भाव है की इसी शरीर में हरी का निवास है जिसे पहचानने की आवश्यकता है।
कबीर दुनियाँ देहुरै, सोस नवाँवण जाइ।
हिरदा भीतर हरि बसै, तूँ ताही सौ ल्यौ लाइ॥
Kabeer Duniyaan Dehurai, Sos Navaanvan Jai.
Hirada Bheetar Hari Basai, Toon Taahee Sau Lyau Lai.
इस संसार के लोग मंदिर में ईश्वर को खोजने के लिए जाते हैं लेकिन वे यह नहीं समझते हैं की हृदय में ही हरी का वास है। भाव है की अपने हृदय का अवलोकन करो, इसी में हरी मिलेंगे लेकिन इसके लिए सद्मार्ग का अनुसरण करना परम आवश्यक है।
भजन श्रेणी : कबीर के दोहे हिंदी मीनिंग (Read More :Kabir Dohe Hindi Arth Sahit)
साथू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सू काँम॥
Jetee Deshaun Aatma, Teta Saaligaraanm.
Saathoo Pratashi Dev Hain, Nahin Paathar Soo Kaanm.
इस संसार में जितनी आत्माएं हैं उतनी ही शालिग्राम की मूर्तियाँ हैं साधू तो स्वंय ही देवता हैं तो उन्हें किसी और देव की पूजा का क्या लाभ है। प्रत्येक व्यक्ति अलग अलग देवों की पूजा करते हैं। यहाँ मूर्ति पूजा का खंडन कर यह सन्देश देने का प्रयास किया गया है की ईश्वर किसी मूर्ति में नहीं अपितु सदाचार, हृदय की शुद्धता में होता है।
सेवैं सालिगराँम कूँ, मन की भ्रांति न जाइ।
सीतलता सुषिनै नहीं, दिन दिन अधकी लाइ॥
Sevain Saaligaraanm Koon, Man Kee Bhraanti Na Jai.
Seetalata Sushinai Nahin, Din Din Adhakee Lai.
मूर्तिपूजा के सबंध में ही वाणी है की जो लोग मूर्तिपूजा करते हैं उनका मन अशांत रहता है, उनका चित्त शांत नहीं रहता है, वस्तुतः वे एक भ्रम में जी रहे होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के चित्त में शान्ति नहीं रहती है, वे सपने में भी शांत नहीं होते हैं और दिन प्रतिदिन अधिक शांत होते जाते हैं।
सेवैं सालिगराँम कूँ, माया सेती हेत।
बोढ़े काला कापड़ा, नाँव धरावैं सेत॥
Sēvaiṁ Sāligarām̐ma Kūm̐, Māyā Sētī Hēta.
Bōṛhē Kālā Kāpaṛā, Nām̐va Dharāvaiṁ Sēta.
लोग पत्थर की मूर्ति की पूजा करते हैं और माया से भी प्रेम करते हैं लेकिन इसका साहेब ने खंडन किया है और कहा है की माया से हेत करने वाले ही मूर्तिपूजा करते हैं। ये लोग ऐसे ही हैं जैसे वे काले कपडे पहने और मूर्तिपूजा करके स्वेत नांव के माध्यम से भव सागर को पार कर लें। ढोंग और पाखण्ड करने से ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है और यह भक्ति मार्ग भी नहीं है।
जप तप दीसै थोथरा, तीरथ ब्रत बेसास।
सूवै सैबल सेविया, यों जग चल्या निरास॥
Jap Tap Deesai Thothara, Teerath Brat Besaas.
Soovai Saibal Seviya, Yon Jag Chalya Niraas.
जप तप आदि कर्म व्यर्थ ही हैं। तीर्थ और व्रत आदि भी कोई महत्त्व नहीं रखते हैं और ऐसे व्यक्तियों को ऐसे ही निराशा हाथ लगती है जैसे सेंवर के फूल के चोंच मारने पर तोते को निराशा ही हाथ लगती है, उसका प्रयोजन शिद्ध नहीं होता है। कर्मकांड सभी निरर्थक है जब तक सद्मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति हृदय से हरी का सुमिरण नहीं करे। इस दोहे में उपमा अलंकार का उपयोग किया गया है।
तीरथ त सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ।
कबीर मूल निकंदिया, कोण हलाहल खाइ॥
Teerath Ta Sab Beladee, Sab Jag Melya Chhai.
Kabeer Mool Nikandiya, Kon Halaahal Khai.
कर्मकांड यथा तीर्थ आदि से कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला है, तीर्थ तो एक विष की बेल है जो पुरे संसार पर छाई हुई है। साहेब ने इसकी जड़ को ही उखाड़ कर फ़ेंक दिया है अब लोग कैसे इसके विषाक्त फलों को खा सकते हैं, भाव है की संसार इसके दुष्परिणामों से बच गया है। वस्तुतः जब तक हृदय में शुद्धता नहीं है, आचरण सत्य आधारित नहीं है और व्यक्ति में मानवीय गुण यथा दया नहीं है तो वह व्यक्ति धार्मिक कैसे कहा जा सकता है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए चित्त का पवित्र होना आवश्यक है।
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाँणि।
दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछाँणि॥
Man Mathura Dil Dvaarika, Kaaya Kaasee Jaanni.
Dasavaan Dvaara Dehura, Taamai Joti Pichhaanni.
यह शरीर ही मथुरा और काशी के समान है और इसका दशम द्वार ही ब्रह्माण्ड रूपी मंदिर है जिसमे पवित्र ज्योति को पहचानने की आवश्यकता है। भाव है की इसी शरीर में हरी का निवास है जिसे पहचानने की आवश्यकता है।
कबीर दुनियाँ देहुरै, सोस नवाँवण जाइ।
हिरदा भीतर हरि बसै, तूँ ताही सौ ल्यौ लाइ॥
Kabeer Duniyaan Dehurai, Sos Navaanvan Jai.
Hirada Bheetar Hari Basai, Toon Taahee Sau Lyau Lai.
इस संसार के लोग मंदिर में ईश्वर को खोजने के लिए जाते हैं लेकिन वे यह नहीं समझते हैं की हृदय में ही हरी का वास है। भाव है की अपने हृदय का अवलोकन करो, इसी में हरी मिलेंगे लेकिन इसके लिए सद्मार्ग का अनुसरण करना परम आवश्यक है।
भजन श्रेणी : कबीर के दोहे हिंदी मीनिंग (Read More :Kabir Dohe Hindi Arth Sahit)
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Author - Saroj Jangir
दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं कबीर के दोहों को अर्थ सहित, कबीर भजन, आदि को सांझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें। |
